मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन ने शनिवार को कहा कि उनकी शेष न्यायिक सेवा में सनातन धर्म उनके लिए मार्गदर्शक रहेगा। चेन्नई में दारा फाउंडेशन द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए उन्होंने कहा, “मुझे उम्मीद है कि मेरी सेवा के साढ़े चार साल होंगे और इन वर्षों में मुझे उत्कृष्टता दिखानी होगी।
मुझे सनातन धर्म को अपने हृदय में रखना होगा।” इस बयान के बाद न्यायपालिका की निष्पक्षता और संवैधानिक मूल्यों को लेकर नई बहस छिड़ गई है।
न्यायमूर्ति स्वामीनाथन बीते कुछ महीनों से जाति, धर्म, सामाजिक न्याय और द्रविड़ राजनीति से जुड़े अपने बयानों को लेकर लगातार चर्चा में रहे हैं। उनके कई सार्वजनिक वक्तव्यों और न्यायिक टिप्पणियों की दलित संगठनों, नागरिक समाज समूहों और राजनीतिक दलों ने कड़ी आलोचना की है।
आलोचकों का आरोप है कि उनके विचार ब्राह्मणवादी और बहुसंख्यकवादी दृष्टिकोण को बढ़ावा देते हैं, जो समानता और धर्मनिरपेक्षता जैसे संवैधानिक मूल्यों के विपरीत हैं।
पिछले वर्ष इंडिया ब्लॉक के सांसदों ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर न्यायमूर्ति स्वामीनाथन के आचरण पर चिंता जताई थी। 11 अगस्त 2025 को लिखे गए इन पत्रों में आरोप लगाया गया था कि वे ब्राह्मण समुदाय से जुड़े अधिवक्ताओं और हिंदू दक्षिणपंथी विचारधाराओं से जुड़े लोगों के प्रति पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाते हैं।
इस बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए डीएमके प्रवक्ता सरवनन अन्नादुरई ने कहा कि 26 जनवरी 1950 से भारत के न्याय प्रशासन का एकमात्र मार्गदर्शक संविधान है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या किसी न्यायाधीश को यह कहने की अनुमति दी जा सकती है कि कुरान या बाइबिल उनके न्यायिक कार्य का मार्गदर्शन करेगी। वहीं वकील आशीष गोयल ने इसे संवैधानिक शपथ का उल्लंघन बताते हुए न्यायाधीश से पद छोड़ने की मांग की।
दलित और जाति-विरोधी आंदोलनों का कहना है कि सनातन धर्म की अवधारणा का उपयोग ऐतिहासिक रूप से जातिगत वर्चस्व और सामाजिक बहिष्कार को वैध ठहराने के लिए किया गया है। आलोचकों का मानना है कि मौजूदा राजनीतिक माहौल में किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा इस तरह का बयान न्यायपालिका की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

