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अवैध रूप से पाकिस्तान से आने वाले दंपति को कोर्ट ने किया बरी, जज बोले- PoK भारत का अभिन्न हिस्सा, विदेशी अधिनियम लागू नहीं होगा

जम्मू-कश्मीर के चडूरा स्थित न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत ने बडगाम के एक दंपति को एनिमी एजेंट्स ऑर्डिनेंस और फॉरेनर्स एक्ट के तहत दर्ज मामले में बरी कर दिया है।

अदालत ने अपने अहम फैसले में कहा कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) भारत का अभिन्न हिस्सा है, और ऐसे में केवल इस आधार पर विदेशी अधिनियम लागू नहीं किया जा सकता।

Bar & Bench की रिपोर्ट के अनुसार, न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी सैयद तैयूब बुखारी ने कहा कि PoK पाकिस्तान का हिस्सा नहीं है, बल्कि भारत का अभिन्न अंग है, जो अवैध रूप से कब्जे में है। इसलिए आरोपियों पर फॉरेनर्स एक्ट की धाराएं लागू नहीं होतीं।

अदालत ने अपने आदेश में कहा: “PoK पाकिस्तान का हिस्सा नहीं है, बल्कि भारत का अभिन्न हिस्सा है जिस पर अवैध कब्जा है। इसलिए आरोपियों पर फॉरेनर्स एक्ट लागू नहीं होता।”

सबूतों की कमी, गवाहों के बयान अविश्वसनीय
कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष E&IMCO एक्ट की धाराओं 2/3 और फॉरेनर्स एक्ट की धारा 14 के तहत अपराध के आवश्यक तत्व साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है। न तो कोई ठोस सबूत पेश किया गया और न ही आरोपियों के खिलाफ कोई आपराधिक मंशा (mens rea) सिद्ध की जा सकी।

यह मामला करीब 20 साल पुराना है। अभियोजन का दावा था कि चडूरा के क्रालपोरा निवासी मोहम्मद मकबूल राथर ने लाइन ऑफ कंट्रोल पार कर PoK में जाकर कथित तौर पर हथियारों की ट्रेनिंग ली, वहां परवीना अख्तर से शादी की और उनके छह बच्चे हुए।

बाद में परिवार बिना किसी वैध दस्तावेज के जम्मू-कश्मीर लौट आया, जहां राथर टैक्सी चालक और कालीन बुनाई का काम करने लगा।

गवाह पेश नहीं, जांच अधिकारी भी नहीं आया
अभियोजन ने 8 गवाहों की सूची दी थी, लेकिन केवल 2 गवाहों का ही बयान दर्ज हुआ। अहम गवाह, जिनमें जांच अधिकारी (IO) भी शामिल थे, अदालत में पेश ही नहीं किए गए।

एक गवाह ने जिरह में स्वीकार किया कि उसे आरोपी के पाकिस्तान जाने की कोई व्यक्तिगत जानकारी नहीं है, जबकि दूसरे गवाह ने अपने पहले बयान से पलटते हुए आरोपों को झूठा और बेबुनियाद बताया।

अदालत ने कहा: “सिर्फ संदेह, चाहे वह कितना भी गंभीर क्यों न हो, ठोस सबूत की जगह नहीं ले सकता।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि यात्रा दस्तावेज, सीमा पार करने के रिकॉर्ड, रिकवरी मेमो या खुफिया रिपोर्ट जैसे कोई भी ठोस दस्तावेजी सबूत पेश नहीं किए गए, जिससे अभियोजन का मामला कमजोर हो गया।

इन सभी आधारों पर अदालत ने दोनों आरोपियों को सभी आरोपों से बरी कर दिया। उनकी जमानत रद्द कर दी गई और जब्त की गई किसी भी संपत्ति को छोड़ने के आदेश दिए गए।

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