केरल, 21 अगस्त 2026: केरल के थुंचथ एझुथाचन मलयालम विश्वविद्यालय में एक दलित पीएचडी छात्रा अनाघा शशि अपनी मां के साथ कथित जातिगत और लैंगिक भेदभाव के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रही हैं। छात्रा का आरोप है कि उन्हें शोध के अवसरों से वंचित रखा गया, गैर-शैक्षणिक और सफाई से जुड़े काम कराए गए और लगातार उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। मां-बेटी ने 14 अगस्त की आधी रात से विश्वविद्यालय परिसर में विरोध शुरू किया था।
अनाघा ने मार्च 2024 में विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग में पीएचडी में दाखिला लिया था। उनका कहना है कि पीएचडी का कोर्सवर्क पूरा किए एक साल से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन अब तक उनका डॉक्टोरल कमेटी का गठन नहीं किया गया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि वार्षिक प्रगति रिपोर्ट जमा करने में देरी के कारण उनकी केरल राज्य विज्ञान, प्रौद्योगिकी और पर्यावरण परिषद (KSCSTE) की फेलोशिप भी खतरे में पड़ गई है।
छात्रा का आरोप है कि शोध कार्य आगे बढ़ाने के बजाय उनसे प्रयोगशाला के उपकरण धोने, पुराने रिकॉर्ड, शोध प्रबंध और अध्ययन यात्रा से जुड़ी रिपोर्ट व्यवस्थित करने तथा सफाई जैसे काम कराए गए। अनाघा ने अपने गाइड अरुण बाबू वी और फैकल्टी सदस्य जैनी वर्गीस पर गैर-शैक्षणिक काम कराने का आरोप लगाया है। उनका यह भी कहना है कि विभाग में उन्हें बैठने के लिए कुर्सी और काम करने की उचित जगह तक नहीं दी गई। उन्होंने दावा किया कि जब उन्होंने इस बारे में सवाल उठाया तो उन्हें गलियारे में खड़े रहने के लिए कहा गया।
अनाघा ने आगे आरोप लगाया कि उनके शोध प्रस्तावों को उचित मार्गदर्शन और समीक्षा के बिना लौटा दिया जाता था और उन्हें कई बार पीएचडी छोड़ने के लिए कहा गया। उनके मुताबिक, UGC-NET पास करने और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद की फेलोशिप मिलने के बाद कथित तौर पर उनके साथ व्यवहार और खराब हो गया। उन्होंने आरोप लगाया कि उनकी फेलोशिप को लेकर जातिगत टिप्पणियां की गईं और कहा गया कि उन्हें यह अनुदान उनकी जाति के कारण मिला है। छात्रा ने यह भी आरोप लगाया कि उन्हें फेलोशिप रद्द किए जाने की धमकी दी गई।
लगातार उत्पीड़न और शोध को लेकर अनिश्चितता के कारण अनाघा ने अपने मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ने का भी दावा किया है। उनकी मां अंबिका शशि ने बताया कि बेटी ने विश्वविद्यालय के पास समुद्र में कूदकर जान देने की कोशिश की थी, जिसके बाद उन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन समेत संबंधित अधिकारियों के सामने शिकायतें दर्ज कराईं। मां का कहना है कि परिवार ने बेटी की शिक्षा के लिए कर्ज लिया है और पीएचडी छोड़ने की कथित धमकियों ने उनकी आर्थिक चिंताओं को और बढ़ा दिया।
अनाघा के मित्र शाहीन ने आरोप लगाया कि मामले में शिक्षकों का रवैया कथित तौर पर ‘ऊंची जाति की मानसिकता’ को दर्शाता है। उन्होंने यह भी दावा किया कि प्रदर्शनकारियों से बातचीत के लिए छात्रा से एससी/एसटी अत्याचार संबंधी शिकायत वापस लेने की शर्त रखी गई थी। वहीं, अनाघा ने अपनी पूर्व रूममेट, जो SFI से जुड़ी बताई गई हैं, पर भी जातिगत उत्पीड़न और शौचालय साफ कराने का आरोप लगाया है। SFI की विश्वविद्यालय इकाई ने मामले पर सीधे टिप्पणी करने से इनकार किया, हालांकि एक इंस्टाग्राम पोस्ट में संगठन ने कहा कि मुद्दे को शोधार्थी को न्याय दिलाने से हटाकर SFI को निशाना बनाने की दिशा में मोड़ा जा रहा है।
छात्रा ने विश्वविद्यालय की एससी/एसटी सेल की जांच को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनका दावा है कि विश्वविद्यालय द्वारा जांच पूरी होने की बात कहे जाने के बावजूद, मामले से जुड़े एक अधिकारी का बयान जुलाई 2026 में दोबारा हस्ताक्षर के लिए मांगा गया। अनाघा ने इसे जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाने वाला तथ्य बताया है। हालांकि, ये सभी आरोप छात्रा और उनके समर्थकों द्वारा लगाए गए हैं और विश्वविद्यालय प्रशासन का पक्ष इन आरोपों पर अलग हो सकता है।
लगातार विरोध के बीच विश्वविद्यालय ने बुधवार को मामले की न्यायिक जांच कराने की घोषणा की। प्रदर्शनकारियों ने इसे अपनी मांगों की दिशा में एक जीत बताया, लेकिन कहा कि जब तक उनकी सभी मांगें पूरी नहीं होतीं, विरोध जारी रहेगा। केरल के उच्च शिक्षा मंत्री रोजी एम. जॉन ने गुरुवार को वीडियो कॉल के जरिए अनाघा से बातचीत की और आवश्यक कदम उठाने का आश्वासन दिया। प्रदर्शनकारी छात्रा की डॉक्टोरल कमेटी गठित करने, वार्षिक प्रगति रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करने और आरोपों की निष्पक्ष जांच के साथ जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।

