गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने गुरुवार को असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा को नोटिस जारी किया। अदालत बंगाली मूल के मुसलमानों को कथित रूप से निशाना बनाकर दिए गए बयानों के खिलाफ दायर जनहित याचिकाओं के समूह पर सुनवाई कर रही थी।
मुख्य न्यायाधीश आशुतोष कुमार और न्यायमूर्ति अरुण देव चौधरी की खंडपीठ ने याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं अभिषेक मनु सिंहवी, चंदर उदय सिंह और मीनाक्षी अरोरा की दलीलें सुनीं। अदालत ने असम के मुख्यमंत्री, असम सरकार और केंद्र सरकार को नोटिस जारी करने का निर्देश दिया।
हालांकि, पीठ ने कहा कि इस चरण में भारतीय जनता पार्टी को नोटिस जारी करना आवश्यक नहीं है, जिसे एक याचिका में प्रतिवादी बनाया गया है। मामले की अगली सुनवाई अप्रैल में निर्धारित की गई है।
इससे पहले ये याचिकाएं असम के प्रख्यात बुद्धिजीवी हिरेंद्रनाथ गोहेन, पूर्व पुलिस महानिदेशक हरेकृष्ण डेका, पत्रकार परेश मलाकर तथा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) द्वारा पहले सर्वोच्च न्यायालय में दायर की गई थीं। सर्वोच्च न्यायालय ने सुनवाई से इनकार करते हुए याचिकाकर्ताओं को गुवाहाटी उच्च न्यायालय जाने का निर्देश दिया था।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि वर्ष 2023 से मुख्यमंत्री द्वारा दिए गए कई सार्वजनिक बयान एक “आदतन और दोहराव वाले पैटर्न” को दर्शाते हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता सिंहवी ने तर्क दिया कि ये टिप्पणियां मुख्यमंत्री की संवैधानिक शपथ का उल्लंघन करती हैं तथा संविधान की प्रस्तावना, भारतीय न्याय संहिता और अनुच्छेद 14 एवं 15 के प्रावधानों के विपरीत हैं।
उन्होंने मुख्यमंत्री के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने और भविष्य में इस प्रकार के बयान देने पर रोक लगाने की मांग की। याचिकाकर्ताओं ने कुछ कथित बयानों का उल्लेख करते हुए कहा कि इनमें “मिया समुदाय” के खिलाफ टिप्पणी, कम वेतन देने की बात, असहयोग के संदर्भ में ऐसी परिस्थितियां बनाने का संकेत, तथा एक निजी विश्वविद्यालय पर “बाढ़ जिहाद” का आरोप शामिल है।
साथ ही, सामाजिक माध्यमों पर प्रसारित एक कृत्रिम बुद्धिमत्ता से निर्मित वीडियो का भी उल्लेख किया गया, जिसे बाद में हटा दिया गया. बहस के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता चंदर उदय सिंह ने कहा कि मुख्यमंत्री से अपेक्षा की जाती है कि वे सामुदायिक पहचान से परे सभी नागरिकों का प्रतिनिधित्व करें।
वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोरा ने भी कहा कि संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों को ऐसे बयान देने से बचना चाहिए, जिनसे कानून-व्यवस्था की स्थिति प्रभावित हो सकती है।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश आशुतोष कुमार ने मौखिक रूप से टिप्पणी की कि अदालत के समक्ष प्रस्तुत बयान “विभाजनकारी प्रवृत्ति” दर्शाते प्रतीत होते हैं। हालांकि, पीठ ने स्पष्ट किया कि किसी भी ठोस आदेश से पहले प्रतिवादियों के जवाब पर विचार किया जाएगा।

