कोई तानाशाह यह नहीं कहता कि संविधान को बदल दो, वह इसे कानून के माध्यम से धीरे-धीरे बदलता है।” यह बात सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता अवनी बंसल ने शनिवार को राजधानी दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित एक महत्वपूर्ण जन संवाद में कही।
कार्यक्रम का विषय था “भारतीय गणराज्य का पुनर्निर्माण: देश में संवैधानिक नैतिकता की पुनर्स्थापना”। यह आयोजन भारतीय संविधान की प्रस्तावना में “पंथनिरपेक्ष” और “समाजवादी” शब्दों के ऐतिहासिक समावेशन की वर्षगांठ के अवसर पर किया गया। कार्यक्रम का आयोजन ‘हम भारत के लोग’ बैनर के तहत किया गया।
वरिष्ठ पत्रकार क़ुर्बान अली ने कहा कि देश का पहला स्वतंत्रता संग्राम बहादुर शाह ज़फ़र के नेतृत्व में और आख़िरी लड़ाई महात्मा गांधी के नेतृत्व में लड़ी गई थी, यही भारत की अद्वितीय विरासत है।
उन्होंने कहा कि भारत हमेशा से समावेशी और सेक्युलर रहा है और आगे भी रहेगा। उन्होंने ज़ोर देते हुए कहा कि स्कूलों में बच्चों को संविधान की प्रस्तावना ज़रूर पढ़ाई जानी चाहिए, ताकि वे अच्छे नागरिक बन सकें।
सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता अवनी बंसल ने कहा कि संविधान को बचाना केवल अदालतों की नहीं बल्कि जनता की जिम्मेदारी है। उन्होंने आरोप लगाया कि आरएसएस और भाजपा संविधान की मूल भावना को कानूनों के ज़रिए कमजोर कर रहे हैं और जब तक “हम भारत के लोग” जीवित हैं, तब तक संविधान भी जीवित रहेगा।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे शाहनवाज़ आलम ने कहा कि संविधान से जुड़े ऐसे कार्यक्रम सरकार को आयोजित करने चाहिए थे, लेकिन सरकार ऐसा नहीं करेगी। उन्होंने कहा कि इंदिरा गांधी ने संविधान की प्रस्तावना में “सेक्युलर” शब्द जोड़ा और उन्होंने अपनी जान देकर भी इसकी रक्षा की।
उन्होंने यह भी कहा कि सेक्युलर भारत के पक्ष में खुलकर बोलने और वोट मांगने का साहस समाज में होना चाहिए।
वरिष्ठ पत्रकार पंकज श्रीवास्तव ने कहा कि संविधान सभी नागरिकों को समान रूप से देखता है और हमें इसी नागरिक दृष्टि की पुनर्स्थापना करनी होगी। वहीं वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत टंडन ने कहा कि समावेशी सोच से ही संवैधानिक व्यवस्था मजबूत होगी।
उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा संविधान की प्रस्तावना से “सेक्युलर” और “समाजवादी” शब्द हटाने का प्रयास कर रही है, जिसका लगातार विरोध जरूरी है।
एनएफवाईएम के चेयरमैन मसीहुज्ज़मा अंसारी ने विपक्ष की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब नागरिकों पर अत्याचार होता है, तब विपक्ष सड़कों पर नजर क्यों नहीं आता। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में विपक्ष की भी उतनी ही जिम्मेदारी है, खासकर तब जब संविधान की मूल भावना खतरे में हो।
इस जन संवाद में हेमंत प्रधान, मुदस्सिर शम्स, रूबी अरुण, शरद जायसवाल, तमजीद अहमद, शिवराम बाल्मीकि, शोएब खान, दीपक चोटीवाला, आरिफ अली तुर्क, मसूद खान, शाहनवाज़ खान, शम्सुल हसन, मिसबाहुल हक़ सहित कई पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी अपने विचार साझा किए।
कार्यक्रम में देश के वरिष्ठ पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को सम्मानित भी किया गया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. मोहम्मद ख़ालिद ख़ान ने किया। शुरुआत राष्ट्रगान से हुई और समापन संविधान की प्रस्तावना के पाठ के साथ किया गया।

