सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें ‘न्यायमूर्ति’ अरविंद कुमार और एन. वी. अंजारिया शामिल हैं, ने आज सुबह उमर ख़ालिद और शरजील इमाम को ज़मानत देने से इनकार करने का फ़ैसला सुनाया है।
यह फ़ैसला कई वर्षों में दायर ज़मानत याचिकाओं के दो अलग-अलग दौरों के बाद आया है, जिन्हें पहले ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट ने ख़ारिज किया था और जो सुप्रीम कोर्ट में भी लगभग एक साल तक लंबित रहने के बाद वापस ले ली गई थीं। यह दूसरी बार है जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा और अब इस फ़ैसले के साथ उसका अंत किया गया है।
इसी मामले में आरोपित गल्फ़िशा फ़ातिमा, मीरान हैदर, शिफ़ा-उर-रहमान, शादाब अहमद और मोहम्मद सलीम ख़ान को इसी आदेश में ज़मानत दे दी गई है।
अदालत ने ख़ालिद और इमाम (जिन्हें ज़मानत नहीं मिली) तथा फ़ातिमा, हैदर, रहमान, अहमद और ख़ान (जिन्हें ज़मानत मिली) के बीच किए गए इस भेद को इस आधार पर सही ठहराया कि पहले दो की भूमिका कथित तौर पर ‘केंद्रीय’ थी, जबकि बाक़ी की भूमिका ‘सहायक’ थी, उस तथाकथित ‘बड़ी साज़िश’ की योजना और क्रियान्वयन में, जिसके कारण फ़रवरी 2020 में दिल्ली में हिंसा भड़की।
हालाँकि यह स्वागत योग्य है कि पाँच लोगों को ज़मानत मिली है, लेकिन उमर ख़ालिद और शरजील इमाम को ज़मानत न देने का सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला भारत के न्यायिक इतिहास में एक काले धब्बे के रूप में दर्ज किया जाएगा। जिस ‘अपराध’ में कुछ को ‘केंद्रीय’ और कुछ को ‘सहायक’ भूमिका वाला बताया गया है, वह एक काल्पनिक कहानी है, जिसे एक अयोग्य और पक्षपाती पुलिस तंत्र ने गढ़ा है ताकि वह उन लोगों की मदद और संरक्षण में अपनी ख़ुद की मिलीभगत छिपा सके, जिन्होंने वास्तव में फ़रवरी 2020 में दिल्ली में हुई हिंसा को भड़काया और अंजाम दिया।
हम सभी ने कपिल मिश्रा (जो अब दिल्ली सरकार में मंत्री हैं) का वह वीडियो देखा है, जिसमें वे एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के बगल में खड़े होकर अराजकता फैलाने की धमकी दे रहे हैं। हमने वे वीडियो भी देखे हैं, जिनमें वर्दीधारी पुलिसकर्मी मुस्लिम इलाक़ों पर हमला करने वाली भीड़ के सामने मूक दर्शक बने खड़े हैं और कई बार सक्रिय रूप से उनकी मदद करते भी दिखाई देते हैं। फ़रवरी 2020 कोई इतना पुराना समय नहीं है कि ये सब बातें भुला दी जाएँ।
फ़रवरी 2020 में हिंसा फैलाने की कोई साज़िश नहीं थी, जिसमें ये अभियुक्त शामिल हों। सुप्रीम कोर्ट ने एक घटिया स्तर के आदेश के ज़रिये एक घिनौने झूठ पर अपनी मुहर लगा दी है। यह आदेश भविष्य के क़ानून के छात्रों को ख़राब न्यायिक फ़ैसलों की भाषा और व्याकरण सिखाने के लिए उदाहरण के तौर पर इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
फ़रवरी 2020 में दिल्ली में हुई हिंसा और उसका अधिकांश विस्तार सत्ताधारी व्यवस्था से जुड़े हिंदू सांप्रदायिक तत्वों का काम था। हिंसा से पहले भड़काऊ भाषण देने वाले लोग आज दिल्ली और केंद्र में मंत्री हैं। अन्य लोग, जिन्होंने नरसंहार जैसे बयान दिए और जो वीडियो में हिंसक भीड़ों का नेतृत्व करते दिखते हैं, खुलेआम घूम रहे हैं। उस समय दिल्ली में रहने वाला कोई भी व्यक्ति, जिसमें थोड़ी-सी भी वस्तुनिष्ठता है, यह जानता है कि यही सच है।
शरजील इमाम हिंसा भड़कने से एक महीने से ज़्यादा समय पहले ही जेल में थे और उमर ख़ालिद ने सार्वजनिक रूप से शांति और अहिंसा की अपील की थी। पिछले कई वर्षों से विभिन्न अदालतों में अभियोजन पक्ष ने, बेतुके ढंग से, इसी अपील को उनके ख़िलाफ़ मुख्य सबूत बताया है।
यह छोड़ भी दें कि जिन तथाकथित ‘बैठकों’ में ख़ालिद और इमाम के शामिल होने का दावा किया गया है, वे दिल्ली पुलिस द्वारा गढ़े गए ‘अल्फ़ा’, ‘ब्रावो’, ‘रोमियो’ और ‘चार्ली’ जैसे रहस्यमय ‘संरक्षित गवाहों’ की परस्पर विरोधी और असंगत गवाहियों पर आधारित अभियोजन की अतिसक्रिय कल्पना की उपज हैं।
सुप्रीम कोर्ट का यह कहना कि इमाम और ख़ालिद के ख़िलाफ़ ‘प्रथम दृष्टया’ मामला बनता है, यह दिखाता है कि वह झूठ और कल्पनाओं पर भरोसा करने को तैयार है। अगर सुप्रीम कोर्ट के 1976 में बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) के अधिकार को निलंबित करने का फ़ैसला (एडीएम जबलपुर) और 2019 में एक मस्जिद को ध्वस्त करने वाले लोगों को इनाम देने वाला फ़ैसला (जबकि न्यायाधीश जानते थे कि यह एक आपराधिक कृत्य था) उसके इतिहास के दो बेहद निचले बिंदु थे, तो आज उमर ख़ालिद और शरजील इमाम को ज़मानत न देने का फ़ैसला न्याय के पतन की एक और गहराई को छूता है।
उमर ख़ालिद और शरजील इमाम पिछले छह वर्षों से जेल में हैं। उनका मुक़दमा किसी वास्तविक अर्थ में शुरू भी नहीं हुआ है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा है कि वे आज के फ़ैसले के एक साल बाद फिर से ज़मानत के लिए आवेदन कर सकते हैं। यह समझ से परे है कि यह फ़ैसला कितनी बेरहमी से यह मान लेता है कि दो युवा लोगों की ज़िंदगी से सात साल की आज़ादी छिन जाना कोई मामूली बात है।
भविष्य कभी उन लोगों को माफ़ नहीं करेगा, जिन्होंने यह फ़ैसला लिखा है। वे अपने नाम के आगे ‘न्यायमूर्ति’ शब्द लगाए जाने के योग्य नहीं हैं।
(यह लेख शुद्धब्रत सेनगुप्ता की फ़ेसबुक पोस्ट का हिंदी अनुवाद है)

