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राजस्थान: पुलिस ने आरोपियों की कराई परेड, हाईकोर्ट ने ‘संस्थागत अपमान’ बताते हुए 24 घंटे के भीतर तस्वीरें हटाने का आदेश दिया

राजस्थान उच्च न्यायालय ने मंगलवार को जैसलमेर पुलिस द्वारा गिरफ्तारी के बाद आरोपियों को सार्वजनिक रूप से परेड कराने और दोष सिद्ध होने से पहले उनकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर प्रसारित करने की प्रथा को “संस्थागत अपमान” करार दिया।

न्यायमूर्ति फरजंद अली ने कहा कि यह आचरण संविधान में निहित मानवीय गरिमा और मौलिक अधिकारों का गंभीर उल्लंघन है।

अदालत ने पुलिस को निर्देश दिया कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रकाशित ऐसी सभी तस्वीरें 24 घंटे के भीतर हटाई जाएं। यह आदेश जैसलमेर के 10 निवासियों द्वारा दायर याचिका पर पारित किया गया, जिसमें पुलिस की इस प्रथा को चुनौती दी गई थी।

अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान का अनुच्छेद 21 केवल जीवन के अधिकार तक सीमित नहीं है, बल्कि गरिमा, सम्मान और आत्मसम्मान के साथ जीने के अधिकार की भी गारंटी देता है।

न्यायमूर्ति अली ने कहा कि गिरफ्तारी के बाद भी किसी व्यक्ति का गरिमा का अधिकार समाप्त नहीं होता। उन्होंने आरोपियों को फर्श पर बैठाने, निर्वस्त्र या आंशिक रूप से निर्वस्त्र करने और अपमानजनक स्थिति में उनकी तस्वीरें खींचकर सार्वजनिक करने को अमानवीय और नीच बताया।

अदालत ने कहा कि अविवाहित महिलाओं के मामलों में इसके परिणाम विशेष रूप से विनाशकारी हो सकते हैं, जिससे उनके विवाह की संभावनाएं, सामाजिक स्वीकार्यता और मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होते हैं।

अदालत ने यह भी कहा कि सोशल मीडिया पर आरोपियों की तस्वीरें प्रसारित होने से अपराधबोध की एक स्थायी छवि बन जाती है, जिसका असर लंबे समय तक रहता है। भले ही आरोपी बाद में बरी हो जाए, लेकिन उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा को हुए नुकसान की भरपाई संभव नहीं हो पाती।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि कोई भी कानून पुलिस को इस तरह के कृत्य की अनुमति नहीं देता।

हाईकोर्ट ने मामले में वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से जवाब तलब किया है और पुलिस आयुक्त को निर्देश दिया है कि वे ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए अपनाए गए सुरक्षा उपायों की विस्तृत जानकारी अदालत के समक्ष प्रस्तुत करें।

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