महाराष्ट्र सरकार द्वारा शिक्षा और सरकारी नौकरियों में मुसलमानों को दिए जाने वाले 5% आरक्षण को समाप्त करने के फैसले को बॉम्बे उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है। मुंबई स्थित एक वकील ने इस निर्णय के खिलाफ याचिका दायर कर इसे असंवैधानिक बताया है।
अधिवक्ता सैयद एजाज अब्बास नकवी ने अधिवक्ता नितिन सतपुते के माध्यम से दायर याचिका में कहा है कि सरकार का यह कदम संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन करता है, पूर्व में दिए गए बाध्यकारी न्यायिक निर्णयों की अनदेखी करता है और मुस्लिम छात्रों के मौलिक अधिकारों का हनन करता है।
इस संबंध में कानूनी पोर्टल Bar & Bench ने भी रिपोर्ट प्रकाशित की है। राज्य सरकार द्वारा हाल ही में जारी प्रस्ताव में जुलाई 2014 के उस आदेश को औपचारिक रूप से रद्द कर दिया गया, जिसके तहत 50 चिन्हित मुस्लिम समुदायों को विशेष पिछड़ा वर्ग-ए (एसबीसी-ए) श्रेणी में जाति सत्यापन और वैधता प्रमाण पत्र प्राप्त करने की अनुमति दी गई थी।
यह श्रेणी सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा वर्ग (एसईबीसी) ढांचे का एक उपसमूह थी। याचिका में कहा गया है कि मुस्लिम एसईबीसी कोटे के संबंध में न तो राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के समक्ष कोई शिकायत दर्ज की गई थी और न ही किसी को इससे प्रतिकूल प्रभाव पड़ा था।
इसके बावजूद सरकार ने यह निर्णय लिया, जो याचिकाकर्ता के अनुसार मनमाना और भेदभावपूर्ण है।
याचिकाकर्ता ने अदालत से राज्य सरकार के फैसले पर अंतरिम रोक लगाने की मांग की है। साथ ही, यह भी आग्रह किया गया है कि सरकार को नीति समाप्त करने के औचित्य के लिए उपयोग किए गए मात्रात्मक आंकड़े अदालत के समक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश दिया जाए। मामले की सुनवाई उचित समय पर होने की संभावना है।
जुलाई 2014 में तत्कालीन कांग्रेस-एनसीपी सरकार ने एक अध्यादेश लाकर मराठा समुदाय को 16% आरक्षण तथा मुसलमानों की निर्दिष्ट उप-जातियों को 5% आरक्षण प्रदान किया था।
नवंबर 2014 में बॉम्बे उच्च न्यायालय ने मराठा कोटा को अमान्य घोषित कर दिया था, लेकिन सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थानों में मुसलमानों के लिए 5% आरक्षण को बरकरार रखा था।
अदालत ने माना था कि लगभग 50 मुस्लिम उप-समुदायों को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा सिद्ध करने के लिए पर्याप्त मात्रात्मक आंकड़े उपलब्ध हैं।
हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि सार्वजनिक रोजगार में आरक्षण 50% की सीमा से अधिक नहीं होना चाहिए।
यह अध्यादेश 23 दिसंबर 2014 को समाप्त हो गया था और बाद में सत्ता में आई भाजपा-नेतृत्व वाली सरकार ने इसे स्थायी कानून के रूप में लागू नहीं किया, जिससे नीति प्रभावी रूप से समाप्त हो गई।
अब इस नए फैसले को लेकर कानूनी लड़ाई फिर से तेज हो गई है और सबकी निगाहें हाई कोर्ट की आगामी सुनवाई पर टिकी हैं।

