हल्द्वानी के बनभूलपुरा रेलवे भूमि विवाद में एक अहम आदेश देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि प्रभावित परिवारों को वैकल्पिक आवास उपलब्ध कराए बिना किसी भी प्रकार की तोड़फोड़ या बेदखली की कार्रवाई नहीं की जाएगी।
अदालत ने स्पष्ट किया कि भूमि भले ही रेलवे की हो, लेकिन बड़े पैमाने पर विस्थापन की स्थिति में मानवीय दृष्टिकोण अपनाना अनिवार्य है।
याचिका 29 प्रभावित निवासियों की ओर से जमीअत उलेमा ए हिंद के मार्गदर्शन में दायर की गई थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य सरकार, रेलवे और जिला प्रशासन को निर्देश दिया कि संभावित रूप से विस्थापित होने वाले परिवारों की पहचान कर उनके पुनर्वास की व्यवस्थित योजना तैयार की जाए। साथ ही अगली सुनवाई तक किसी भी ध्वस्तीकरण पर अंतरिम रोक जारी रखने का आदेश दिया गया।
मामले की गंभीरता को देखते हुए न्यायालय ने नैनीताल जिला प्रशासन और हल्द्वानी के स्थानीय अधिकारियों को पंजीकरण शिविर लगाने का निर्देश दिया।
पात्र परिवारों को Pradhan Mantri Awas Yojana (ईडब्ल्यूएस श्रेणी) के तहत आवेदन करने में सहायता प्रदान की जाएगी। रमज़ान और ईद को ध्यान में रखते हुए अदालत ने 19 मार्च के बाद शिविर आयोजित करने और कम से कम एक सप्ताह तक संचालित रखने को कहा है।
सुनवाई के दौरान यह भी बताया गया कि यदि विस्थापन होता है तो भारतीय रेलवे और राज्य सरकार मिलकर प्रभावित परिवारों को छह महीने तक मासिक आर्थिक सहायता प्रदान करेंगे।
केंद्र सरकार ने दलील दी कि क्षेत्र में रेलवे अवसंरचना का विस्तार आवश्यक है, जबकि याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि लगभग 50,000 लोगों के पुनर्वास की प्रक्रिया बेहद जटिल है।
फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने कहा कि जब तक हर प्रभावित व्यक्ति को सम्मानजनक वैकल्पिक आवास नहीं मिलता, तब तक न्याय अधूरा रहेगा।
उन्होंने कहा कि संवैधानिक व्यवस्था में लंबे समय से बसे नागरिकों को बिना पुनर्वास के बेदखल नहीं किया जा सकता। अदालत का यह आदेश फिलहाल हजारों परिवारों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है, और मामले की अगली सुनवाई अप्रैल में होगी।

