पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले से रोज़गार की तलाश में छत्तीसगढ़ गए 20 से 23 प्रवासी मजदूरों को कथित तौर पर ‘बांग्लादेशी’ होने के संदेह में हिरासत में लिए जाने का मामला सामने आया है। परिवारों और स्थानीय सूत्रों के मुताबिक, पुलिस ने इन मजदूरों को केवल बंगाली भाषा बोलने के आधार पर संदिग्ध माना।
मुस्लिम मिरर की रिपोर्ट के मुताबिक, अधिकांश मजदूर मुर्शिदाबाद के सहाबाद गांव, सूती थाना क्षेत्र के रहने वाले हैं। वे कई साल पहले काम की तलाश में छत्तीसगढ़ गए थे और बिलासपुर इलाके में फेरी लगाकर सामान बेचने समेत अलग-अलग काम करते थे। उनकी कमाई से उनके परिवारों का गुजारा चलता था।
परिजनों के अनुसार, 4 सितंबर की रात सिरगिट्टी थाना क्षेत्र के चुंचियापारा-गणेश नगर इलाके में पुलिस पहुंची और कई मजदूरों को हिरासत में ले लिया। परिवारों का आरोप है कि इससे पहले भी मजदूरों को दस्तावेज जमा करने या उनकी जांच कराने के लिए तीन-चार बार थाने बुलाया गया था।
परिजनों ने दावा किया कि मजदूरों के पास आधार कार्ड, वोटर आईडी और पैन कार्ड जैसे दस्तावेज मौजूद हैं। इसके बावजूद उन्हें बांग्लादेशी नागरिक होने के संदेह में हिरासत में लिया गया। रिश्तेदारों द्वारा जिन लोगों के नाम बताए गए हैं, उनमें एजाजुल शेख, सफीकुल आलम, इस्लाम शेख, किरण शेख, इब्राहिम शेख, एंजामुल शेख और मोसिकुल खां शामिल हैं।
एक हिरासत में लिए गए मजदूर की पत्नी अफसाना बीबी ने आरोप लगाया कि पुलिस ने मजदूरों के मोबाइल फोन जब्त कर लिए, जिसके बाद परिवार के लोग उनसे संपर्क नहीं कर पा रहे हैं। उन्होंने बच्चों और परिवार की स्थिति को लेकर चिंता जताई। वहीं सहाबाद के ठेकेदार रमजान एसके का दावा है कि मजदूरों को पहले थाने ले जाया गया, फिर बिलासपुर एसपी कार्यालय और बाद में रायपुर स्थित एक डिटेंशन कैंप ले जाया गया।
इस मामले में माइग्रेंट वर्कर्स यूनिटी फोरम ने प्रशासन से मजदूरों की पहचान की तत्काल जांच करने, उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने और यदि वे भारतीय नागरिक हैं तो उन्हें रिहा कर घर वापस भेजने की मांग की है। संगठन के महासचिव आसिफ फारूक ने कहा कि मजदूरों के परिवार गंभीर चिंता और मानसिक तनाव से गुजर रहे हैं और प्रशासनिक एवं कानूनी स्तर पर तत्काल हस्तक्षेप की जरूरत है।

