पोप लियो ने ईसाई और मुस्लिम समुदायों से मिलकर मानवता की सेवा करने और वैश्विक उदासीनता को एकजुटता में बदलने का आह्वान किया है। उन्होंने कहा कि दुनिया में बढ़ती संवेदनहीनता और विभाजन के दौर में दोनों धर्मों को करुणा और सहानुभूति के साझा मूल्यों के आधार पर साथ काम करना चाहिए।
पोप लियो ने यह बातें जॉर्डन के रॉयल इंस्टीट्यूट फॉर इंटर-फेथ स्टडीज और होली सी के डिकैस्टरी फॉर इंटररिलीजियस डायलॉग द्वारा आयोजित एक अंतरधार्मिक संगोष्ठी के दौरान कहीं। सम्मेलन का विषय “आधुनिक समय में मानवीय करुणा और सहानुभूति” था।
धार्मिक नेताओं और विद्वानों को संबोधित करते हुए पोप लियो ने कहा कि करुणा ईसाई धर्म और इस्लाम दोनों की केंद्रीय शिक्षा है। उन्होंने कहा कि इस्लामी परंपरा में करुणा को ईश्वर की ओर से दिया गया दिव्य उपहार माना जाता है और “अल-रऊफ” जैसे नाम इसकी याद दिलाते हैं।
उन्होंने कहा कि ईसाई धर्म में यीशु मसीह मानव पीड़ा को साझा करके करुणा के जीवंत प्रतीक बनते हैं।
पोप लियो ने गरीबों, जरूरतमंदों और शरणार्थियों की सहायता को धार्मिक जिम्मेदारी बताते हुए कहा कि पीड़ितों के प्रति संवेदनशील होना केवल एक विकल्प नहीं बल्कि नैतिक कर्तव्य है। उन्होंने शरणार्थियों को शरण देने के लिए की सराहना करते हुए इसे मानवता के लिए महत्वपूर्ण योगदान बताया।
अपने संबोधन में पोप लियो ने आधुनिक तकनीक और डिजिटल मीडिया के प्रभाव पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि आज लोग पहले से अधिक जुड़े हुए हैं, लेकिन लगातार हिंसा और पीड़ा की तस्वीरें देखने से कई बार संवेदनशीलता कम हो जाती है।
उन्होंने कहा कि दुनिया में ऐसी मानसिकता बढ़ रही है जिसमें लोग दूसरों के दुख को अपनी जिम्मेदारी नहीं मानते। पोप ने इसे समाज के लिए खतरनाक संकेत बताया।
अपने भाषण के अंत में पोप लियो ने ईसाई और मुस्लिम समुदायों से वैश्विक पीड़ा और विभाजन के खिलाफ एक साथ खड़े होने की अपील की। उन्होंने कहा कि दोनों धर्मों की आध्यात्मिक विरासत दुनिया में शांति, करुणा और इंसानियत को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
उन्होंने कहा, “हमें वहां मानवता को पुनर्जीवित करना है जहां वह ठंडी पड़ गई है, पीड़ितों को आवाज देनी है और उदासीनता को एकजुटता में बदलना है।”

