कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि आधार कार्ड, पैन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र और बैंक खाता अपने आप में किसी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं हैं।
अदालत ने यह टिप्पणी एक बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) याचिका को खारिज करते हुए की, जिसमें विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के बाद हिरासत में लिए गए एक व्यक्ति की रिहाई की मांग की गई थी।
न्यायमूर्ति देबांगसु बसाक और न्यायमूर्ति अजय कुमार गुप्ता की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि केवल आधार, पैन, बैंक खाता या मतदाता पहचान पत्र के आधार पर भारतीय नागरिकता को निर्णायक रूप से साबित नहीं किया जा सकता।
अदालत ने स्पष्ट किया कि मतदाता पहचान पत्र केवल यह दर्शाता है कि किसी समय व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में दर्ज था, लेकिन यह नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं है।
याचिका सुमन मोल्ला ने दायर की थी, जिन्होंने खुद को हिरासत में लिए गए व्यक्ति का चाचा बताते हुए दावा किया कि उसकी अपील लंबित रहने के बावजूद उसे हिरासत में लिया गया। हालांकि, राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि सत्यापन के दौरान संबंधित व्यक्ति की पहचान बांग्लादेशी नागरिक के रूप में हुई है और उसके खिलाफ गृह मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के अनुसार कार्रवाई की जा रही है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिकाकर्ता द्वारा पेश किए गए दस्तावेजों में कई विसंगतियों का भी उल्लेख किया। पीठ ने कहा कि जन्म प्रमाण पत्र प्रस्तुत नहीं किया गया, अलग-अलग दस्तावेजों में पिता का नाम अलग-अलग दर्ज था और भूमि अभिलेखों के आधार पर नागरिकता का दावा निर्णायक रूप से स्थापित नहीं होता। अदालत ने यह भी नोट किया कि याचिकाकर्ता ने अलग-अलग अवसरों पर अपने और बंदी के रिश्ते को लेकर अलग-अलग दावे किए थे।
इन तथ्यों के आधार पर हाई कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता संबंधित व्यक्ति की भारतीय नागरिकता साबित करने में विफल रहा है। इसलिए अदालत ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज करते हुए हिरासत को चुनौती देने से इनकार कर दिया।
यह फैसला ऐसे समय आया है जब पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया और मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने को लेकर बहस जारी है। इस प्रक्रिया को लेकर विभिन्न संगठनों और मानवाधिकार विशेषज्ञों ने पारदर्शिता तथा अल्पसंख्यकों पर संभावित प्रभाव को लेकर चिंता भी जताई है।

