सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि न्यायपालिका लोकतंत्र में आलोचना से ऊपर नहीं है और उसकी निष्पक्ष, तथ्यात्मक एवं रचनात्मक आलोचना जरूरी है। हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि बच्चों को यह सिखाना कि न्यायपालिका भ्रष्ट है, उनके मन में संवैधानिक संस्था के प्रति अविश्वास पैदा कर सकता है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने एनसीईआरटी की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका से संबंधित विवादित सामग्री पर स्वतः संज्ञान लेकर शुरू की गई कार्यवाही को बंद करते हुए यह टिप्पणी की। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे।
अदालत ने कहा कि न्यायपालिका की आलोचना लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है और इससे संस्थागत जवाबदेही बेहतर हो सकती है। पीठ ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका एक संस्था के रूप में आलोचना से बच नहीं सकती। हालांकि, अदालत ने कहा कि आलोचना उचित मंच पर निष्पक्ष, तर्कसंगत और तथ्यों पर आधारित तरीके से होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से बच्चों के लिए तैयार की जाने वाली शैक्षणिक सामग्री में अपुष्ट आरोपों को शामिल करने के खिलाफ चेतावनी दी। सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा, “न्यायाधीश संत नहीं होते। हम आलोचना के लिए खुले हैं। लेकिन जब आप 11 साल के बच्चे को यह सिखाते हैं कि न्यायपालिका भ्रष्ट है, तो आप उस संस्था में अविश्वास के बीज बोते हैं जो संविधान की रक्षा करती है।”
द आब्जर्वर पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, यह मामला कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक ‘एक्सप्लोरिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड’ के ‘हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका’ अध्याय से जुड़ा था। अध्याय में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ नाम से एक हिस्सा शामिल किया गया था, जिस पर इस साल की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया था।
फरवरी में सुप्रीम कोर्ट ने विवादित पाठ्यपुस्तक के आगे प्रकाशन, पुनर्मुद्रण और डिजिटल वितरण पर रोक लगा दी थी तथा पहले से बाजार में मौजूद प्रतियों को वापस लेने का निर्देश दिया था। इसके बाद केंद्र सरकार को विवादित सामग्री की समीक्षा के लिए विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश दिया गया।
विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों के बाद अध्याय में बदलाव किए गए। संशोधित सामग्री की समीक्षा के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इसे न्यायपालिका का तथ्यात्मक और संतुलित विवरण बताया। अदालत ने कहा कि नए अध्याय में न्यायपालिका की संवैधानिक भूमिका और स्वतंत्रता के साथ-साथ उसकी जवाबदेही के तंत्र को भी समझाया गया है। अदालत के अनुसार, संशोधित अध्याय न तो न्यायपालिका का अनावश्यक महिमामंडन करता है और न ही अनुचित आलोचना करता है।
मामले के दौरान एनसीईआरटी के निदेशक दिनेश प्रसाद सकलानी और स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग के सचिव संजय कुमार ने अदालत से बिना शर्त माफी मांगी। सरकार ने अदालत को बताया कि पुरानी पाठ्यपुस्तक की 82,440 प्रतियां वापस मंगाई जा चुकी हैं। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने कार्यवाही के दौरान जारी किए गए कारण बताओ नोटिस वापस लेते हुए 1 सितंबर को मामले को बंद कर दिया।
मामला बंद करते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि उसका हस्तक्षेप न्यायपालिका की लोकतांत्रिक जांच को रोकने के उद्देश्य से नहीं था। पीठ ने कहा कि असहमति, विचार-विमर्श और गहन चर्चा जीवंत लोकतंत्र के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। साथ ही अदालत ने सार्वजनिक संस्थानों से संबंधित भविष्य की शैक्षणिक सामग्री तैयार करते समय उचित सावधानी और सुरक्षा उपाय अपनाने का निर्देश दिया।

