नई दिल्ली: एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (एपीसीआर) ने कांवड़ यात्रा 2026 को लेकर अपनी रिपोर्ट जारी की है। “कांवड़ यात्रा 2026: हिंसा, निगरानी, बहिष्कार और सार्वजनिक दंड से मुक्ति” शीर्षक वाली इस रिपोर्ट में यात्रा के दौरान और उसके आसपास कथित शारीरिक हिंसा, सड़क से जुड़े हमले, आर्थिक एवं खाद्य बहिष्कार, प्रशासनिक पाबंदियों और सार्वजनिक व्यवस्था के असमान प्रवर्तन से जुड़े मामलों को दर्ज किया गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक कांवड़ यात्रा 30 जुलाई से 11 अगस्त 2026 तक चली। हालांकि, यात्रा से जुड़े कई मामले मुख्य यात्रा अवधि से पहले, उसके दौरान और उसके तुरंत बाद भी सामने आए। एपीसीआर ने उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, दिल्ली और बिहार में सामने आए मामलों का दस्तावेजीकरण किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यात्रा से जुड़े कुछ घटनाक्रम अगस्त महीने तक जारी रहे।
एपीसीआर के अनुसार रिपोर्ट में 13 दिनों की अवधि के दौरान 18 कथित घृणा-आधारित घटनाओं को दर्ज किया गया है। इनमें नौ ऐसे मामले शामिल हैं, जिन्हें संगठन ने शारीरिक या जबरदस्ती वाली घटनाओं के रूप में दस्तावेजीकृत किया है। इसके अलावा चार या उससे अधिक बहिष्कार अथवा भेदभावपूर्ण खाद्य-व्यवस्था से जुड़े मामलों का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट में अश्लील सार्वजनिक आचरण से जुड़े पांच या उससे अधिक वायरल अथवा रिपोर्ट किए गए संदर्भों का भी जिक्र है, जिनकी स्वतंत्र पुष्टि की आवश्यकता बताई गई है।
रिपोर्ट में कुल 18 कथित घातक हमलों का भी उल्लेख किया गया है। हालांकि, एपीसीआर ने स्पष्ट किया है कि ये आंकड़े रिपोर्ट में संकलित मामलों से संबंधित हैं और इन्हें आधिकारिक राष्ट्रीय अपराध आंकड़ा नहीं माना जाना चाहिए। संगठन ने यह भी कहा है कि रिपोर्ट का उद्देश्य सभी कांवड़ यात्रियों के व्यवहार को एक जैसा बताना नहीं है, बल्कि यात्रा के दौरान दर्ज किए गए विशिष्ट मामलों को दस्तावेजीकृत करना है।
एपीसीआर ने अपनी रिपोर्ट में सार्वजनिक व्यवस्था के नियमों के असमान तरीके से लागू किए जाने को प्रमुख चिंता बताया है। रिपोर्ट के मुताबिक यातायात प्रतिबंधों का असर स्थानीय निवासियों, यात्रियों और कारोबारियों पर पड़ा, जबकि सड़क किनारे लगाए गए प्रतिबंधों से खाद्य विक्रेताओं और मुस्लिम स्वामित्व वाले कारोबारों पर भी प्रभाव पड़ा। संगठन ने कहा है कि प्रशासनिक पाबंदियों और vigilante यानी स्वयंभू निगरानी/कार्रवाई के मेल से ऐसी परिस्थितियां बन सकती हैं, जहां आर्थिक बहिष्कार और शारीरिक दबाव एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं।
एपीसीआर ने कहा कि रिपोर्ट का उद्देश्य कांवड़ यात्रा से जुड़े दर्ज मामलों को एक सार्वजनिक रिकॉर्ड में सामने लाना और धार्मिक पहचान से अलग हटकर सार्वजनिक व्यवस्था एवं कानून के समान और लगातार प्रवर्तन की जरूरत पर ध्यान आकर्षित करना है। रिपोर्ट में दस्तावेजीकृत घटनाओं और संगठन की व्याख्या के बीच अंतर रखा गया है तथा जिन मामलों में वीडियो या ऑनलाइन सामग्री की उपलब्धता के बावजूद स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है, उन्हें अलग से चिन्हित किया गया है।
नई दिल्ली: एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (एपीसीआर) ने कांवड़ यात्रा 2026 को लेकर अपनी रिपोर्ट जारी की है। “कांवड़ यात्रा 2026: हिंसा, निगरानी, बहिष्कार और सार्वजनिक दंड से मुक्ति” शीर्षक वाली इस रिपोर्ट में यात्रा के दौरान और उसके आसपास कथित शारीरिक हिंसा, सड़क से जुड़े हमले, आर्थिक एवं खाद्य बहिष्कार, प्रशासनिक पाबंदियों और सार्वजनिक व्यवस्था के असमान प्रवर्तन से जुड़े मामलों को दर्ज किया गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक कांवड़ यात्रा 30 जुलाई से 11 अगस्त 2026 तक चली। हालांकि, यात्रा से जुड़े कई मामले मुख्य यात्रा अवधि से पहले, उसके दौरान और उसके तुरंत बाद भी सामने आए। एपीसीआर ने उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, दिल्ली और बिहार में सामने आए मामलों का दस्तावेजीकरण किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यात्रा से जुड़े कुछ घटनाक्रम अगस्त महीने तक जारी रहे।
एपीसीआर के अनुसार रिपोर्ट में 13 दिनों की अवधि के दौरान 18 कथित घृणा-आधारित घटनाओं को दर्ज किया गया है। इनमें नौ ऐसे मामले शामिल हैं, जिन्हें संगठन ने शारीरिक या जबरदस्ती वाली घटनाओं के रूप में दस्तावेजीकृत किया है। इसके अलावा चार या उससे अधिक बहिष्कार अथवा भेदभावपूर्ण खाद्य-व्यवस्था से जुड़े मामलों का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट में अश्लील सार्वजनिक आचरण से जुड़े पांच या उससे अधिक वायरल अथवा रिपोर्ट किए गए संदर्भों का भी जिक्र है, जिनकी स्वतंत्र पुष्टि की आवश्यकता बताई गई है।
रिपोर्ट में कुल 18 कथित घातक हमलों का भी उल्लेख किया गया है। हालांकि, एपीसीआर ने स्पष्ट किया है कि ये आंकड़े रिपोर्ट में संकलित मामलों से संबंधित हैं और इन्हें आधिकारिक राष्ट्रीय अपराध आंकड़ा नहीं माना जाना चाहिए। संगठन ने यह भी कहा है कि रिपोर्ट का उद्देश्य सभी कांवड़ यात्रियों के व्यवहार को एक जैसा बताना नहीं है, बल्कि यात्रा के दौरान दर्ज किए गए विशिष्ट मामलों को दस्तावेजीकृत करना है।
एपीसीआर ने अपनी रिपोर्ट में सार्वजनिक व्यवस्था के नियमों के असमान तरीके से लागू किए जाने को प्रमुख चिंता बताया है। रिपोर्ट के मुताबिक यातायात प्रतिबंधों का असर स्थानीय निवासियों, यात्रियों और कारोबारियों पर पड़ा, जबकि सड़क किनारे लगाए गए प्रतिबंधों से खाद्य विक्रेताओं और मुस्लिम स्वामित्व वाले कारोबारों पर भी प्रभाव पड़ा। संगठन ने कहा है कि प्रशासनिक पाबंदियों और vigilante यानी स्वयंभू निगरानी/कार्रवाई के मेल से ऐसी परिस्थितियां बन सकती हैं, जहां आर्थिक बहिष्कार और शारीरिक दबाव एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं।
एपीसीआर ने कहा कि रिपोर्ट का उद्देश्य कांवड़ यात्रा से जुड़े दर्ज मामलों को एक सार्वजनिक रिकॉर्ड में सामने लाना और धार्मिक पहचान से अलग हटकर सार्वजनिक व्यवस्था एवं कानून के समान और लगातार प्रवर्तन की जरूरत पर ध्यान आकर्षित करना है। रिपोर्ट में दस्तावेजीकृत घटनाओं और संगठन की व्याख्या के बीच अंतर रखा गया है तथा जिन मामलों में वीडियो या ऑनलाइन सामग्री की उपलब्धता के बावजूद स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है, उन्हें अलग से चिन्हित किया गया है।

