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मध्य प्रदेश में UCC विधेयक को कैबिनेट की मंजूरी, तीन तलाक, बहुविवाह और निकाह हलाला पर प्रतिबंध का प्रस्ताव

मध्य प्रदेश मंत्रिमंडल ने समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक के मसौदे को मंजूरी दे दी है। प्रस्तावित विधेयक में तीन तलाक, बहुविवाह और निकाह हलाला पर प्रतिबंध लगाने के साथ-साथ सभी समुदायों में एकविवाह को अनिवार्य बनाने का प्रावधान किया गया है। यह विधेयक सोमवार से शुरू होने वाले मध्य प्रदेश विधानसभा के मानसून सत्र में पेश किया जाएगा।

प्रस्तावित कानून के तहत विवाह और तलाक का पंजीकरण अनिवार्य होगा। हालांकि, संविधान के तहत विशेष संरक्षण प्राप्त अनुसूचित जनजातियों को इसके दायरे से बाहर रखा गया है।

मुख्यमंत्री मोहन यादव के अनुसार, यूसीसी का उद्देश्य धर्म से परे विवाह, तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े मामलों के लिए एक समान कानूनी ढांचा तैयार करना है।

विधेयक में लिव-इन रिलेशनशिप का पंजीकरण भी अनिवार्य करने का प्रस्ताव है। इसके तहत साथ रहने वाले जोड़ों को संबंध शुरू होने के एक महीने के भीतर रजिस्ट्रार के सामने घोषणा पत्र जमा करना होगा।

ऐसा न करने पर तीन महीने तक की सजा या 10 हजार रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। गलत जानकारी देने और नोटिस के बावजूद घोषणा पत्र जमा न करने पर भी अलग-अलग सजा और जुर्माने का प्रावधान किया गया है।

प्रस्तावित कानून में लिव-इन रिलेशनशिप से पैदा होने वाले बच्चों को कानूनी मान्यता देने का भी प्रावधान है। यदि पुरुष साथी संबंध खत्म कर देता है, तो महिला सक्षम अदालत के माध्यम से भरण-पोषण की मांग कर सकेगी। विधेयक में विवाह, गोद लेने, सरोगेसी, सहायक प्रजनन तकनीक या लिव-इन रिलेशनशिप से पैदा हुए बच्चों को समान कानूनी दर्जा देने की बात कही गई है।

विधेयक में बेटों और बेटियों को उनकी वैवाहिक स्थिति की परवाह किए बिना समान उत्तराधिकार अधिकार देने का प्रस्ताव है। इसके अलावा विधवा और विधुर दोनों को मृतक जीवनसाथी की संपत्ति पर समान अधिकार देने की बात कही गई है।

बच्चों की कस्टडी से जुड़े मामलों में भी अदालतों को माता-पिता के दावों के बजाय बच्चे के सर्वोत्तम हित और कल्याण को प्राथमिकता देने का प्रावधान किया गया है।

मुख्यमंत्री मोहन यादव ने प्रस्तावित यूसीसी को समानता, न्याय और संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया है। उन्होंने दावा किया कि जस्टिस रंजना देसाई समिति की ओर से किए गए परामर्श के दौरान बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलाओं और पुरुषों ने प्रस्ताव का समर्थन किया। वहीं, प्रस्तावित विधेयक को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज होने की संभावना है।

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