जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के छात्र नजीब अहमद के लापता होने के दस साल पूरे होने के करीब हैं, लेकिन अब तक उनका कोई सुराग नहीं मिल सका है। इस मामले में न्याय और जवाबदेही की मांग को लेकर बापसा (BAPSA), फ्रेटरनिटी मूवमेंट और एमएसएफ ने 14 अक्टूबर को जेएनयू परिसर में संयुक्त मार्च निकालने का ऐलान किया है। संगठनों ने जांच एजेंसियों, विश्वविद्यालय प्रशासन और तत्कालीन जेएनयू छात्रसंघ नेतृत्व पर मामले में लापरवाही बरतने और न्याय मिलने में बाधा पहुंचाने के आरोप लगाए हैं।
संगठनों के मुताबिक, मार्च रात 9 बजे बराक हॉस्टल से शुरू होकर गंगा ढाबा तक जाएगा। संयुक्त बयान “क्या जेएनयू को नजीब याद है?” में संगठनों ने सवाल उठाया कि दस साल बीत जाने के बाद भी नजीब कहां हैं और उनकी गुमशुदगी के लिए जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही कब तय होगी। नजीब अहमद जैव प्रौद्योगिकी में एमएससी प्रथम वर्ष के छात्र थे। वह 15 अक्टूबर 2016 को विश्वविद्यालय परिसर से लापता हो गए थे। संगठनों का आरोप है कि इससे एक रात पहले हॉस्टल में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) से जुड़े छात्रों की भीड़ ने उनके साथ मारपीट की थी।
बयान में आरोप लगाया गया है कि नजीब के लापता होने के बाद उन्हें हिंसा का शिकार मानने के बजाय संदेह के घेरे में खड़ा किया गया। संगठनों ने तत्कालीन वामपंथी नेतृत्व वाले जेएनयू छात्रसंघ पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि उसके कुछ पदाधिकारियों ने हॉस्टल प्रशासन को ऐसे पत्र लिखे, जिनमें नजीब को कथित तौर पर अपराधी और मानसिक रूप से अस्वस्थ बताने वाली बातें कही गई थीं। संगठनों का दावा है कि इससे ऐसा माहौल बना, जिसमें नजीब के साथ हुई हिंसा और उनके लापता होने के मामले पर गंभीरता से ध्यान देने के बजाय उन्हें ही जिम्मेदार ठहराने की कोशिश हुई। हालांकि, ये आरोप संगठनों के संयुक्त बयान पर आधारित हैं।
संगठनों ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) और दिल्ली पुलिस की जांच पर भी सवाल उठाए हैं। बयान के अनुसार, सीबीआई ने मई 2018 में कहा था कि उसे ऐसा कोई सबूत नहीं मिला, जिससे यह साबित हो कि नजीब के साथ कोई अपराध हुआ था। संगठनों ने आरोप लगाया कि जांच एजेंसियों ने नजीब का पता लगाने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए और उनके लापता होने के शुरुआती दिनों में उन्हें आतंकवादी संगठनों से जोड़ने जैसी अटकलों को भी जगह मिली। उन्होंने कथित जांच संबंधी खामियों का जिक्र करते हुए कहा कि नजीब के साथ मारपीट के आरोपों का सामना कर रहे छात्रों से हिरासत में पूछताछ नहीं की गई और कुछ मोबाइल फोन की फॉरेंसिक जांच भी पूरी नहीं हुई। इन आरोपों पर संबंधित पक्षों का जवाब इस रिपोर्ट में शामिल नहीं है।
बयान में तत्कालीन छात्रसंघ नेतृत्व और विश्वविद्यालय प्रशासन पर इस मामले में मुस्लिम विरोधी पूर्वाग्रह की अनदेखी करने का भी आरोप लगाया गया है। संगठनों का कहना है कि नजीब के मामले को केवल छात्रों के बीच झगड़े के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि मुस्लिम छात्रों के खिलाफ भेदभाव और हिंसा के व्यापक संदर्भ में भी समझा जाना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि नजीब के लापता होने के शुरुआती 40 घंटों में छात्र समुदाय को मामले की गंभीरता से अवगत कराने और उनके समर्थन में एकजुटता दिखाने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए गए।
बापसा, फ्रेटरनिटी मूवमेंट और एमएसएफ ने कहा कि 14 अक्टूबर का मार्च केवल एक बरसी मनाने के लिए नहीं, बल्कि नजीब के बारे में जवाब मांगने और उनकी मां फातिमा नफीस के संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए आयोजित किया जा रहा है। संगठनों ने नजीब के परिवार के साथ खड़े रहने और उनकी तलाश जारी रखने का संकल्प जताया है। उनका कहना है कि दस साल बाद भी नजीब का पता नहीं चलना गंभीर सवाल खड़े करता है और इस मामले में जवाबदेही तय होनी चाहिए।

