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आप उनके घर में कैसे घुस सकते हैं? नदीन खान को कथित तौर पर नजरबंद करने पर दिल्ली हाईकोर्ट ने पुलिस से मांगा जवाब

नई दिल्ली: एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (एपीसीआर) के राष्ट्रीय सचिव और मानवाधिकार कार्यकर्ता नदीम खान को कथित तौर पर आठ घंटे तक उनके परिसर में रोकने के मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस से सवाल किए हैं। अदालत ने पूछा कि पुलिस बिना किसी कानूनी आदेश के उनके घर में कैसे दाखिल हुई और उनकी आवाजाही पर रोक लगाने का क्या आधार था। अदालत ने दिल्ली पुलिस को दो सप्ताह के भीतर स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है।

सोमवार को मामले की सुनवाई कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश नितिन वासुदेव सांबरे और न्यायमूर्ति संजय शर्मा की खंडपीठ ने की। सुनवाई के दौरान अदालत ने मौखिक रूप से पुलिस से पूछा, “आप इस व्यक्ति के घर में कैसे घुस सकते हैं? आपको अपना कर्तव्य निभाने का अधिकार है, लेकिन आप ऐसा किस आधार पर कर सकते हैं? उन्हें रोकने का कानूनी आधार क्या है? हमें कानून में इसका प्रावधान दिखाइए।” नदीम खान ने 29 सितंबर को कथित तौर पर रोके जाने की घटना को चुनौती देते हुए याचिका दाखिल की थी।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता शाहरुख आलम ने अदालत को बताया कि 29 सितंबर को पुलिसकर्मी बिना कोई नोटिस या आदेश दिखाए नदीम खान के कार्यालय और आवासीय परिसर में दाखिल हुए थे। दोनों एक ही परिसर में स्थित हैं। उनके मुताबिक, पुलिसकर्मी सुबह करीब 9:30 बजे से शाम 5:30 बजे तक वहां मौजूद रहे, जिसके कारण नदीम खान जंतर-मंतर पर प्रस्तावित शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल नहीं हो सके। यह प्रदर्शन धार्मिक स्थलों पर हमलों और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के जरिए नागरिकों को मताधिकार से वंचित किए जाने के मुद्दे पर आयोजित किया जाना था।

नदीम खान की याचिका के अनुसार, उन्होंने 19 सितंबर को संसद मार्ग पुलिस थाने में प्रदर्शन की अनुमति के लिए आवेदन दिया था, लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं मिला। बाद में एक अज्ञात फोन कॉल के जरिए उन्हें बताया गया कि अनुमति रद्द कर दी गई है। याचिका में दावा किया गया है कि उन्होंने इस फैसले को संबंधित पुलिस अधिकारी के समक्ष चुनौती दी, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। नदीम खान ने आरोप लगाया कि उन्हें न तो औपचारिक रूप से गिरफ्तार किया गया और न ही कथित हिरासत के कारण लिखित रूप में बताए गए। उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया गया और उनके परिजनों को भी इसकी सूचना नहीं दी गई।

दिल्ली पुलिस ने अदालत में नदीम खान को हिरासत में लेने से इनकार किया। पुलिस के वकील ने कहा कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी गई थी और बाद में शाहीन बाग पुलिस थाने को सूचना मिली कि वह अनुमति न मिलने के बावजूद प्रदर्शन में शामिल होने जा सकते हैं। पुलिस ने दलील दी कि अधिकारियों को केवल उनकी आवाजाही सीमित रखने के उद्देश्य से तैनात किया गया था और वे शाम 5:30 बजे वहां से चले गए थे। अदालत ने पुलिस की इस दलील को दर्ज किया कि फिलहाल नदीम खान की आवाजाही पर कोई प्रतिबंध नहीं है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने पुलिस की ओर से दिए गए इस बयान को भी दर्ज किया कि थाना प्रभारी के निर्देश पर अब नदीम खान को पुलिस की ओर से फोन नहीं किए जाएंगे। अदालत ने दिल्ली पुलिस को दो सप्ताह के भीतर स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया। नदीम खान ने सुनवाई के बाद कहा कि मानवाधिकार कार्यकर्ता के साथ इस तरह का व्यवहार संवैधानिक सुरक्षा उपायों की अनदेखी को दर्शाता है। उन्होंने सवाल उठाया कि पुलिस संवैधानिक दिशानिर्देशों के तहत काम कर रही है या राजनीतिक नेतृत्व के निर्देशों पर।

याचिका में दिल्ली पुलिस के उस निषेधाज्ञा आदेश को भी चुनौती दी गई है, जिसके तहत नई दिल्ली जिले में जंतर-मंतर समेत विभिन्न स्थानों पर पांच या उससे अधिक लोगों के एकत्र होने, प्रदर्शन, धरना, भाषण देने और बैनर या तख्तियां ले जाने पर पूर्व लिखित अनुमति की शर्त लगाई गई थी। नदीम खान ने दलील दी है कि इस तरह के व्यापक प्रतिबंध संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) और 19(1)(ख) के तहत मिले अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सभा के अधिकारों को प्रभावित करते हैं। याचिका में अनुच्छेद 14 और 21 के उल्लंघन का भी आरोप लगाया गया है। अदालत के समक्ष अब दिल्ली पुलिस को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी है।

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