पढ़ेगा बिहार या कर्ज़ के बोझ तले दबेगा बिहार? राज्य सरकार ने स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड योजना 4 लाख से घटाकर ₹2 लाख की
बिहार की शिक्षा नीति आज एक ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी है जहाँ उच्च शिक्षा का सपना और मध्यम तथा निम्न-मध्यम वर्गीय परिवारों की आर्थिक मजबूरी आपस में सीधे टकरा रहे हैं। ‘पढ़ेगा बिहार, बढ़ेगा बिहार’ के लुभावने नारे के बीच वर्ष 2016 में शुरू की गई ‘स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड योजना’ (BSCC) राज्य के गरीब और वंचित वर्ग के लिए उम्मीद की एक बड़ी किरण बनकर उभरी थी। योजना का प्राथमिक और मूल उद्देश्य ही यह था कि आर्थिक संसाधनों के अभाव में किसी भी होनहार छात्र का सपना अधूरा न रहे, जिसके लिए ₹4 लाख तक की सीधी और सुलभ वित्तीय सहायता इसकी मुख्य पहचान बनाई गई थी। हालांकि, वर्ष 2026-27 के वित्तीय सत्र से इस योजना में किए गए ढांचागत बदलावों ने एक गंभीर और तीखा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या बिहार में उच्च शिक्षा का मार्ग वाकई सुगम हो रहा है या विद्यार्थियों को धीरे-धीरे व्यावसायिक बैंकिंग प्रणाली के कर्ज के बोझ तले धकेला जा रहा है?
‘ब्याजमुक्त सहायता’ के स्थान पर ‘आंशिक छूट’ का नया समीकरण: नवीनतम व्यवस्था के तहत बिहार स्टेट एजुकेशन फाइनेंस कॉरपोरेशन के माध्यम से सीधे दी जाने वाली ₹4 लाख की राशि को घटाकर मात्र ₹2 लाख कर दिया गया है, जबकि इससे अधिक की आवश्यकता वाले छात्रों को केंद्र सरकार के ‘PM-Vidyalaxmi Portal’ और व्यावसायिक बैंकों के दरवाजे खटखटाने के लिए छोड़ दिया गया है। यद्यपि सरकार का तर्क है कि कुल वित्तीय सहायता का दायरा समाप्त नहीं हुआ है और ₹2 लाख से ऊपर की राशि पर PM-Vidyalaxmi के तहत 3 प्रतिशत की ब्याज सहायता (Interest Subvention) उपलब्ध कराई जाएगी, लेकिन नीतिगत धरातल पर “पूर्णतः ब्याजमुक्त सहायता” और “आंशिक ब्याज सब्सिडी” में ज़मीन-आसमान का अंतर है। यदि किसी बैंक की मानक शिक्षा ऋण दर 10 से 11 प्रतिशत है, तो 3 प्रतिशत की सरकारी छूट के बावजूद छात्र पर 7 से 8 प्रतिशत वार्षिक ब्याज का भार बना रहेगा, जिसे किसी भी दृष्टि से सुलभ शिक्षा नहीं कहा जा सकता।
‘राष्ट्रीय कोटा’ और सीमित पात्रताओं की जटिल भूलभुलैया: इसके अलावा, यह 3 प्रतिशत ब्याज सहायता कोई सार्वभौमिक अधिकार नहीं है, बल्कि इसे बेहद जटिल और सीमित शर्तों में बांध दिया गया है। सरकारी नियमों के अनुसार, इस लाभ के लिए ₹8 लाख की पारिवारिक आय सीमा, विशिष्ट मान्यता प्राप्त उच्च शिक्षण संस्थानों में मेरिट के आधार पर नामांकन की अनिवार्यता और सबसे चिंताजनक बात प्रतिवर्ष राष्ट्रीय स्तर पर अधिकतम 1 लाख नए विद्यार्थियों का कोटा निर्धारित किया गया है। इसका सीधा और कड़वा अर्थ यह है कि बिहार जैसे विशाल युवा आबादी वाले राज्य का हर वह छात्र जिसे ₹2 लाख से अधिक की जरूरत है, यह मानकर नहीं चल सकता कि उसे सरकारी राहत मिलेगी। कोटा या जटिल शर्तों से बाहर रहने वाले विद्यार्थियों को पूरी तरह बाजार दर पर भारी बैंक ऋण उठाने पर मजबूर होना पड़ेगा।
डिग्रियों के साथ बढ़ता ईएमआई का मानसिक व आर्थिक दबाव: एक गरीब या निम्न-मध्यम वर्गीय परिवार के छात्र के लिए यह केवल कागजी गणना नहीं, बल्कि जीवन-मरण का प्रश्न है। उच्च शिक्षा में कॉलेज फीस के साथ-साथ हॉस्टल, भोजन, किताबें, लैपटॉप और अन्य दैनिक खर्च मिलाकर कुल लागत ₹2 लाख की सीमा को बेहद आसानी से पार कर जाती है। रोजगार की अनिश्चितताओं के दौर में, जब एक युवा कॉलेज से बाहर निकलेगा तो उसके हाथों में केवल डिग्री नहीं, बल्कि लाखों रुपये का बैंक कर्ज और ईएमआई (EMI) का भारी दबाव होगा। यद्यपि राज्य सरकार 2026-27 के लिए मंजूर ₹950 करोड़ के बजट और ‘कोलैटरल-फ्री’ ऋण का हवाला देकर अपनी पीठ थपथपा रही है, लेकिन सरकारी बजट का ढोल पीटना और एक छात्र का व्यक्तिगत वित्तीय जोखिम कम होना दो पूरी तरह अलग बातें हैं।
कल्याणकारी राज्य की जवाबदेही पर खड़े उठते गंभीर सवाल: सरकार को केवल यह बताने के बजाय कि व्यवस्था बनी हुई है, यह स्पष्ट करना चाहिए कि राष्ट्रीय कोटा समाप्त होने पर बाकी पात्र छात्रों के ब्याज का बोझ कौन उठाएगा। यदि शिक्षा का अंतिम परिणाम छात्र को केवल एक भारी कर्जदार बनाना है, तो यह नीति सुलभ शिक्षा के बजाय कल्याणकारी राज्य की नाकामी को दर्शाती है। बिहार के युवाओं को आज ऐसी नीति की आवश्यकता है जो उन्हें बिना किसी डर के सपने देखने की आजादी दे, न कि ऐसी व्यवस्था की जो उन्हें कॉलेज में कदम रखते ही कर्ज के बोझ तले दबा दे।
(यह लेखक के अपने विचार है, लेखक अतीकुर रहमान जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्र है)

