एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (APCR) की एक फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि तेलंगाना में हाल के सांप्रदायिक तनाव और हिंसा की घटनाएं अलग-थलग नहीं हैं, बल्कि राजनीतिक ध्रुवीकरण, संस्थागत पक्षपात और प्रशासनिक विफलता के एक व्यापक पैटर्न का हिस्सा हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, इन घटनाओं का सबसे अधिक असर आदिवासी, मुस्लिम, दलित और अन्य हाशिए पर रहने वाले समुदायों पर पड़ा है।
“Belonging, Coexistence & Fractures” शीर्षक वाली इस रिपोर्ट में हैदराबाद, मेडक–मलकाजगिरी, नारायणपेट, मेडक, निज़ामाबाद, निर्मल, आदिलाबाद और भैंसा सहित कई जिलों में किए गए फील्ड विज़िट, पीड़ितों की गवाही और स्थानीय लोगों से साक्षात्कार के आधार पर निष्कर्ष निकाले गए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, कई स्थानीय विवाद—जैसे ज़मीन, धार्मिक प्रथाएं, शोर-शराबा या प्रशासनिक फैसले—बाद में संगठित राजनीतिक हस्तक्षेप के जरिए सांप्रदायिक टकराव में बदल दिए गए।
APCR ने आरोप लगाया है कि चुनाव जैसे संवेदनशील राजनीतिक दौर में दक्षिणपंथी संगठनों और उनसे जुड़े नेटवर्क की भूमिका इन तनावों को बढ़ाने में अहम रही है। रिपोर्ट का कहना है कि कई मामलों में पुलिस और जिला प्रशासन निष्पक्ष भूमिका निभाने में विफल रहे, जिससे अल्पसंख्यक समुदायों को देरी से न्याय, झूठे मुकदमे, अत्यधिक बल प्रयोग और हिरासत में उत्पीड़न का सामना करना पड़ा।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सांप्रदायिक नैरेटिव का इस्तेमाल ज़मीन छिनने, बेरोज़गारी, सार्वजनिक सेवाओं में गिरावट और कल्याण योजनाओं तक असमान पहुंच जैसे बुनियादी मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए किया जा रहा है।
इससे आदिवासी, दलित और मुस्लिम समुदायों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा किया जा रहा है, जबकि वे समान सामाजिक-आर्थिक समस्याओं से जूझ रहे हैं।
APCR ने निष्कर्ष निकाला है कि तेलंगाना में सांप्रदायिक हिंसा कोई स्वाभाविक सामाजिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति के तहत “निर्मित और बनाए रखी जा रही” है। संगठन ने स्वतंत्र जांच, नफरत फैलाने वाले भाषणों पर कार्रवाई, भूमि और आवास अधिकारों की सुरक्षा तथा पुलिस-प्रशासन में निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए ठोस सुधारों की मांग की है।

