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ईसाइयों के खिलाफ बढ़ती हिंसा और भेदभाव पर जन न्यायाधिकरण रिपोर्ट, संस्थागत विफलता का आरोप

भारत में ईसाई समुदाय के खिलाफ हिंसा, सामाजिक बहिष्कार और भेदभाव के बढ़ते मामलों को लेकर नागरिक समाज के सदस्यों ने गंभीर चिंता जताई है। दिल्ली के प्रेस क्लब में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में वक्ताओं ने इसे “संस्थागत विफलता” करार देते हुए कहा कि देश के कई राज्यों में ईसाइयों के संवैधानिक अधिकारों का हनन हो रहा है।

यह प्रेस कॉन्फ्रेंस भारत में ईसाइयों के खिलाफ हिंसा पर गठित जन न्यायाधिकरण (पीपुल्स ट्रिब्यूनल) की सुनवाई के बाद आयोजित की गई। न्यायाधिकरण ने अप्रैल 2026 में छत्तीसगढ़ और मई 2026 में ओडिशा का दौरा कर सैकड़ों प्रभावित लोगों, समुदाय प्रतिनिधियों, वकीलों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गवाही दर्ज की।

सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात और ओडिशा से आए प्रतिनिधियों ने ईसाई समुदायों के खिलाफ कथित हिंसा, सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार, गांवों से निष्कासन, पूजा स्थलों पर हमलों और दफनाने के अधिकार से वंचित किए जाने जैसे मामलों को सामने रखा।

वरिष्ठ पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता John Dayal ने कहा कि अंतरात्मा की स्वतंत्रता, धर्म की स्वतंत्रता और समान नागरिकता जैसे संवैधानिक अधिकार गंभीर चुनौती का सामना कर रहे हैं। वहीं यूनाइटेड क्रिश्चियन फोरम के राष्ट्रीय समन्वयक A. C. Michael ने आरोप लगाया कि शांतिपूर्ण प्रार्थना सभाओं और धार्मिक आयोजनों को सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरे के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।

ओडिशा के फादर Ajay Singh ने गवाही में दावा किया कि कई स्थानों पर ईसाई परिवारों को अपने मृत परिजनों को स्थानीय कब्रिस्तानों में दफनाने की अनुमति नहीं दी गई। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ मामलों में अंतिम संस्कार जुलूसों को भी रोका गया।

छत्तीसगढ़ के प्रतिनिधि डिग्री चौहान ने कहा कि हिंसा की घटनाओं की तुलना में दर्ज एफआईआर की संख्या बहुत कम है और कई मामलों में जांच तथा न्याय की प्रक्रिया धीमी रही है। उन्होंने पुलिस की निष्क्रियता और संस्थागत प्रतिक्रिया पर भी सवाल उठाए।

न्यायाधिकरण के सदस्यों ने अपने निष्कर्षों में कहा कि प्रस्तुत गवाहियां केवल अलग-अलग घटनाओं का विवरण नहीं हैं, बल्कि भेदभाव और बहिष्कार के एक व्यापक पैटर्न की ओर संकेत करती हैं। सामाजिक कार्यकर्ता Harsh Mander ने कहा कि सामाजिक बहिष्कार, जबरन विस्थापन और पूजा स्थलों पर हमलों जैसी घटनाएं समान नागरिकता के संवैधानिक वादे को कमजोर करती हैं।

वक्ताओं ने केंद्र और राज्य सरकारों से अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा सुनिश्चित करने, दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने और धार्मिक स्वतंत्रता तथा संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए प्रभावी कदम उठाने की मांग की।

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