नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि मतदाता सूची से किसी व्यक्ति का नाम हटाए जाने से उसकी भारतीय नागरिकता स्वतः समाप्त नहीं हो जाती। अदालत ने कहा कि नागरिकता का निर्धारण भारतीय नागरिकता अधिनियम के तहत केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है और चुनाव आयोग के पास नागरिकता तय करने का संवैधानिक अधिकार नहीं है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल हैं, पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान मतदाता सूची से हटाए गए नामों के लिए अपील प्रक्रिया में सुधार की मांग वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने कहा कि चुनाव आयोग की भूमिका मतदाता सूची को बनाए रखने तक सीमित है। उन्होंने कहा कि यदि किसी व्यक्ति की नागरिकता पर संदेह है और उसका नाम मतदाता सूची से हटाया जाता है, तो मामले को नागरिकता अधिनियम के तहत निर्णय के लिए केंद्र सरकार के समक्ष भेजा जाना चाहिए। जब तक नागरिकता पर सक्षम प्राधिकारी का फैसला नहीं हो जाता, तब तक केवल मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के आधार पर नागरिकता समाप्त नहीं मानी जा सकती।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने अदालत को बताया कि बड़ी संख्या में ऐसे लोगों को कथित तौर पर सरकारी कल्याणकारी योजनाओं से वंचित किया जा रहा है, जिनके नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं, जबकि उनकी अपीलें अभी लंबित हैं।
उनके अनुसार, 19 अपीलीय न्यायाधिकरणों के समक्ष लगभग 34 लाख अपीलें लंबित हैं, जबकि अब तक करीब 38 हजार मामलों का ही निपटारा हुआ है। उन्होंने यह भी बताया कि निपटाए गए मामलों में लगभग 70 प्रतिशत अपीलें स्वीकार की गई हैं।
वरिष्ठ वकील ने आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल में कुछ लोगों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS), अन्नपूर्णा योजना और जाति प्रमाण पत्र जैसी सुविधाओं से भी वंचित किया जा रहा है। उन्होंने अदालत से मांग की कि नागरिकता संबंधी अपीलों पर अंतिम फैसला होने तक लोगों के नागरिक अधिकारों और कल्याणकारी योजनाओं के लाभों को रोका न जाए।
याचिका में अपील प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और सुलभ बनाने के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए सुनवाई, इलेक्ट्रॉनिक और भौतिक माध्यमों से नोटिस की तामील, अपीलों के समयबद्ध निपटारे और हिंदी, बांग्ला तथा अंग्रेजी में सरल मार्गदर्शिका जारी करने की मांग की गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले को पश्चिम बंगाल SIR से जुड़ी अन्य लंबित याचिकाओं के साथ जोड़ दिया है। वहीं, एक अध्ययन के अनुसार, पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया के दौरान ‘विचाराधीन’ सूची से हटाए गए 27 लाख से अधिक मतदाताओं में 70 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम बताए गए हैं। अध्ययन में दावा किया गया है कि कई लोगों के नाम कथित तौर पर नाम, माता-पिता के नाम या अन्य रिकॉर्ड में मामूली विसंगतियों के आधार पर जांच के दायरे में आए।

