नई दिल्ली: दिल्ली की एक विशेष एनआईए अदालत ने पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) के संस्थापक और अध्यक्ष ई. अबू बकर की नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी है।
राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) द्वारा दर्ज इस मामले में उन पर और पीएफआई के अन्य नेताओं पर भारत की निर्वाचित सरकार को उखाड़ फेंकने तथा वर्ष 2047 तक इस्लामी खिलाफत स्थापित करने की साजिश रचने का आरोप है। अदालत ने कहा कि जमानत देने के लिए कोई नया आधार सामने नहीं आया है।
विशेष एनआईए न्यायाधीश प्रशांत शर्मा ने अपने आदेश में कहा कि इससे पहले भी अबू बकर की जमानत याचिकाएं खारिज हो चुकी हैं और मौजूदा याचिका में ऐसी कोई नई परिस्थिति नहीं बताई गई, जिसके आधार पर उन्हें राहत दी जा सके। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह उनकी तीसरी जमानत याचिका थी, जिसे अस्वीकार किया गया है।
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने दलील दी कि ई. अबू बकर का स्वास्थ्य लगातार खराब हो रहा है और मुकदमे में देरी के कारण उन्हें जमानत दी जानी चाहिए। हालांकि अदालत ने कहा कि बचाव पक्ष यह स्पष्ट नहीं कर सका कि मुकदमे में देरी किन कारणों से हुई है। अदालत ने यह भी माना कि जेल प्रशासन द्वारा आरोपी को आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं।
वहीं, एनआईए ने जमानत का विरोध करते हुए अदालत को बताया कि जांच के दौरान जुटाए गए पर्याप्त साक्ष्यों के आधार पर आरोप पहले ही तय किए जा चुके हैं।
एजेंसी का कहना है कि पीएफआई के नेताओं ने युवाओं को कट्टरपंथ की ओर प्रेरित करने, प्रशिक्षण शिविर आयोजित करने, धन जुटाने और देश में सांप्रदायिक तनाव फैलाने की साजिश रची थी।
गौरतलब है कि कुछ सप्ताह पहले इसी अदालत ने पीएफआई और उसके 25 सदस्यों के खिलाफ गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) तथा अन्य धाराओं के तहत आरोप तय करने का आदेश दिया था।
अदालत ने अपने आदेश में कहा था कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से प्रथम दृष्टया एक व्यापक साजिश का गंभीर संदेह पैदा होता है। अब आरोप तय होने के बाद इस महीने के अंत में मामले की नियमित सुनवाई शुरू होने की संभावना है।

