अहमदाबाद: गुजरात हाईकोर्ट ने सूरत के नासिर नगर में 30 मई को हुए विध्वंस अभियान को प्रथम दृष्टया “अवैध” करार देते हुए सूरत नगर निगम (एसएमसी) को 100 से अधिक प्रभावित परिवारों के पुनर्वास की योजना प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।
अदालत ने कहा कि विस्थापित परिवारों को या तो उसी स्थान पर दोबारा बसाया जाए या फिर उन्हें किसी अन्य स्थान पर उचित आवास उपलब्ध कराया जाए।
26 प्रभावित निवासियों की याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति निखिल एस. करिएल ने एसएमसी आयुक्त को 9 जुलाई तक पुनर्वास की विस्तृत योजना अदालत में पेश करने का आदेश दिया। साथ ही गुजरात सरकार को भी पूरे मामले पर अपना पक्ष हलफनामे के माध्यम से स्पष्ट करने के निर्देश दिए गए हैं।
सुनवाई के दौरान एसएमसी आयुक्त के हलफनामे का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि संबंधित स्थल पर केवल सीमांकन (डिमार्केशन) की प्रक्रिया प्रस्तावित थी, लेकिन बिना किसी वैध आदेश के वहां विध्वंस कर दिया गया। अदालत ने टिप्पणी की कि हलफनामे से स्पष्ट होता है कि यह कार्रवाई पूरी तरह अवैध थी।
हाई कोर्ट ने कहा कि लगभग 100 परिवार अपने घरों से बेघर हो गए हैं और ऐसे में केवल अधिकारियों का निलंबन पर्याप्त नहीं है। अदालत ने राज्य सरकार से पूछा कि अब तक जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कोई आपराधिक मामला क्यों दर्ज नहीं किया गया।
अदालत ने पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि यदि सीमांकन की कार्रवाई अवैध विध्वंस में बदल गई थी, तो पुलिस का कर्तव्य था कि वह तुरंत हस्तक्षेप करती। न्यायालय ने कहा कि पुलिस केवल मूकदर्शक नहीं रह सकती थी।
एसएमसी आयुक्त ने अदालत को बताया कि प्रारंभिक जांच समिति की रिपोर्ट के आधार पर पांच नगर निगम अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया है।
वहीं राज्य सरकार ने अपने हलफनामे में कहा कि नासिर नगर क्षेत्र में कुछ आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोग और पहले से चिन्हित बांग्लादेशी घुसपैठिए रहते थे, लेकिन यह भी स्पष्ट किया कि इन तथ्यों को किसी भी निर्माण को ध्वस्त करने का औचित्य नहीं माना जा सकता।
मामले की अगली सुनवाई 9 जुलाई को होगी। तब तक अदालत ने एसएमसी और गुजरात सरकार दोनों को विध्वंस की जिम्मेदारी तय करने तथा प्रभावित परिवारों के पुनर्वास से संबंधित विस्तृत हलफनामे दाखिल करने का निर्देश दिया है।

