महाराष्ट्र के नासिक की एक अदालत ने टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) की पूर्व कर्मचारी निदा खान को जमानत दे दी है। निदा खान कथित धर्मांतरण मामले में आरोपी हैं और वर्तमान में गर्भवती हैं।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि किसी महिला के लिए जेल में बच्चे को जन्म देना अत्यंत पीड़ादायक स्थिति है और ऐसे मामले में अजन्मे बच्चे के हितों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के. जी. जोशी ने 6 जुलाई को पारित आदेश में कहा कि गर्भवती महिला को जेल में प्रसव के लिए मजबूर करना एक असहनीय अनुभव होगा।
अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि “भगवान कृष्ण की तरह जेल में जन्म देने का आघात या उससे जुड़ा सामाजिक कलंक किसी भी महिला के लिए कष्टदायक है।” न्यायालय ने कहा कि ऐसी स्थिति से बचने और नवजात शिशु के बेहतर भविष्य को देखते हुए आरोपी के पक्ष में न्यायिक विवेक का प्रयोग उचित है।
निदा खान अपने पहले बच्चे की उम्मीद कर रही हैं। उन्हें टीसीएस ने 9 अप्रैल को निलंबित किया था और 7 मई को गिरफ्तार किया गया था। अदालत ने उन्हें 75 हजार रुपये के निजी मुचलके और समान राशि के एक जमानतदार पर रिहा करने का आदेश दिया।
साथ ही यह भी कहा कि मामले की जांच पूरी हो चुकी है और आरोपपत्र दाखिल किया जा चुका है, इसलिए उन्हें न्यायिक हिरासत में रखने की अब कोई आवश्यकता नहीं है।
खान की ओर से पेश अधिवक्ता राहुल कसलीवाल ने अदालत में दलील दी कि उनकी मुवक्किल को झूठा फंसाया गया है। उन्होंने बताया कि निदा खान एक शिक्षित पेशेवर हैं और दर्ज नौ एफआईआर में से केवल एक में उनका नाम शामिल है। दूसरी ओर, अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया कि उन्होंने शिकायतकर्ता को धार्मिक साहित्य उपलब्ध कराया, मोबाइल में इस्लामी एप्लिकेशन इंस्टॉल किए, नमाज सिखाई और हिजाब पहनने के लिए प्रेरित किया।
यह मामला नासिक स्थित टीसीएस के बीपीओ केंद्र से जुड़ा है, जहां आठ लोगों के खिलाफ यौन उत्पीड़न, जबरन धर्म परिवर्तन के प्रयास, धार्मिक भावनाएं आहत करने और मानसिक उत्पीड़न सहित विभिन्न आरोपों में नौ एफआईआर दर्ज की गई हैं।
यह विवाद तब सामने आया था जब एक हिंदुत्व संगठन ने आरोप लगाया कि एक हिंदू महिला कर्मचारी पर कार्यस्थल पर इस्लामी धार्मिक प्रथाएं अपनाने का दबाव बनाया गया।
टीसीएस ने पहले अपने बयान में कहा था कि कंपनी उत्पीड़न और किसी भी प्रकार की जबरदस्ती के प्रति “जीरो टॉलरेंस” की नीति अपनाती है। कंपनी ने जांच पूरी होने तक आरोपित कर्मचारियों को निलंबित कर दिया था। साथ ही स्पष्ट किया था कि निदा खान किसी प्रबंधकीय पद पर नहीं थीं, जबकि कुछ मीडिया रिपोर्टों में उन्हें कथित साजिश का “मास्टरमाइंड” बताया गया था।
इस बीच, एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (एपीसीआर) की महाराष्ट्र इकाई की एक तथ्य-जांच टीम ने दावा किया है कि अब तक की जांच में किसी संगठित “लव जिहाद” या “कॉर्पोरेट जिहाद” साजिश की पुष्टि करने वाले ठोस साक्ष्य सामने नहीं आए हैं। हालांकि, मामले की न्यायिक प्रक्रिया अभी जारी है और अंतिम निर्णय अदालत द्वारा सुनाया जाना बाकी है।

