कुछ शख्सियतें ऐसी होती हैं जिनका परिचय किसी पद, उपाधि या प्रशंसा का मोहताज नहीं होता। उनका पूरा जीवन ही उनका परिचय बन जाता है। दारुल उलूम नदवतुल उलेमा, लखनऊ के नायब मोहतमिम और उस्ताद-ए-हदीस हज़रत मौलाना अब्दुल अज़ीज़ भटकली दामत बरकातुहुम ऐसी ही हस्तियों में शुमार किए जाते हैं। उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी इल्म की ख़िदमत, छात्रों की तरबियत, दीन की ख़िदमत और नदवा की परंपरा की हिफाज़त के लिए समर्पित कर दी।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
मौलाना अब्दुल अज़ीज़ भटकली का जन्म 7 जून 1952 को कर्नाटक के ऐतिहासिक शहर भटकल में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा अपने नगर में प्राप्त करने के बाद उन्होंने जामिया इस्लामिया भटकल में दीनी तालीम हासिल की। ज्ञान की प्यास उन्हें दारुल उलूम नदवतुल उलेमा, लखनऊ ले आई, जहाँ उन्होंने पूरी लगन और एकाग्रता के साथ आलिमियत और फ़ज़ीलत की पढ़ाई पूरी की। 1977 में शिक्षा पूर्ण होने के बाद वे अपने वतन लौटे, लेकिन हज़रत मौलाना सैयद अबुल हसन अली नदवी (अली मियाँ) के विशेष आग्रह पर 1978 में फिर नदवा लौट आए और यहीं से उनकी आजीवन सेवाओं का नया अध्याय शुरू हुआ।
नदवा की ख़िदमत में समर्पित जीवन
नदवा वापसी के बाद उन्हें अध्यापन का दायित्व सौंपा गया। समय के साथ वे हदीस और तफ़्सीर के प्रतिष्ठित शिक्षक बने और बाद में नायब मोहतमिम का महत्वपूर्ण पद संभाला। पिछले कई दशकों से वे दारुल उलूम नदवतुल उलेमा के शैक्षिक और प्रशासनिक कार्यों का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं।
विशेष रूप से पिछले कुछ वर्षों में, जब संस्थान के प्रशासन पर अतिरिक्त ज़िम्मेदारियाँ आईं, तब उन्होंने अत्यंत निष्ठा, ईमानदारी और धैर्य के साथ उन्हें निभाया। अनेक लोगों का मानना है कि कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने संस्थान की व्यवस्था और गरिमा को बनाए रखने में उल्लेखनीय योगदान दिया।
अकाबिर का विश्वास
मौलाना अब्दुल अज़ीज़ भटकली को नदवा के महान विद्वानों का विशेष विश्वास प्राप्त रहा। हज़रत मौलाना अबुल हसन अली नदवी के साथ उनकी निकटता केवल प्रशासनिक नहीं थी, बल्कि यह एक आध्यात्मिक और बौद्धिक संबंध भी था। उन्हें विभिन्न यात्राओं में साथ रहने, सेवा करने और मार्गदर्शन प्राप्त करने का अवसर मिला।
बाद में हज़रत मौलाना राबे हसनी नदवी और मौलाना डॉ. सईदुर्रहमान आज़मी नदवी के साथ भी उन्होंने लंबे समय तक मिलकर संस्थान की सेवा की। उनके सहयोगियों के अनुसार वे हमेशा संस्थान के हित को व्यक्तिगत सुविधा से ऊपर रखते रहे।
सादगी और इंसानियत
मौलाना अब्दुल अज़ीज़ भटकली की सबसे बड़ी पहचान उनकी सादगी, विनम्रता और मेहमाननवाज़ी है। जो भी उनसे मिलने जाता है, वह उनके अपनत्व और ख़ुलूस का ज़िक्र किए बिना नहीं रहता। व्यस्तता और स्वास्थ्य संबंधी कठिनाइयों के बावजूद वे लोगों से मिलते हैं, उनकी बातें सुनते हैं, छात्रों की रहनुमाई करते हैं और संस्थान के बारे में विस्तार से जानकारी देते हैं।

उनके निकट रहने वाले लोगों के अनुसार, वे अपनी व्यक्तिगत तकलीफ़ों से अधिक संस्थान की प्रतिष्ठा और उसके मिशन की चिंता करते हैं। यही भावना उनके व्यक्तित्व को विशिष्ट बनाती है।
इल्म के साथ वसीअ नज़रिया
मौलाना अब्दुल अज़ीज़ भटकली केवल एक शिक्षक या प्रशासक नहीं हैं, बल्कि व्यापक दृष्टिकोण रखने वाले इस्लामी विद्वान भी हैं। वे सभी दीनी मदरसों और संस्थाओं को उम्मत की साझा विरासत मानते हैं। उनके विचार में दीन की सेवा किसी एक संस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि हर वह संस्था सम्मान की पात्र है जो इस्लाम की शिक्षा और समाज की भलाई के लिए काम कर रही है।
वे बार-बार इस बात पर ज़ोर देते हैं कि वर्तमान समय की आवश्यकता आपसी मतभेदों को बढ़ाना नहीं, बल्कि उम्मत की एकता, शिक्षा और नैतिक निर्माण पर ध्यान देना है।
छात्रों के लिए एक आदर्श
दशकों से उन्होंने हजारों छात्रों की शिक्षा और चरित्र निर्माण में भूमिका निभाई है। उनके शिष्य बताते हैं कि वे केवल किताबें नहीं पढ़ाते, बल्कि जीवन जीने का तरीका भी सिखाते हैं। अनुशासन, विनम्रता, अध्ययन की गंभीरता और दूसरों के प्रति सम्मान—ये सभी गुण उनके व्यक्तित्व से झलकते हैं।
मौलाना अब्दुल अज़ीज़ भटकली का जीवन इस बात का प्रमाण है कि किसी भी संस्था की वास्तविक शक्ति उसके भवनों में नहीं, बल्कि उन लोगों में होती है जो निःस्वार्थ भाव से उसकी सेवा करते हैं। उन्होंने अपने ज्ञान, चरित्र, धैर्य और समर्पण से दारुल उलूम नदवतुल उलेमा की परंपरा को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
ऐसी शख्सियतें केवल अपने दौर की नहीं होतीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बन जाती हैं। दुआ है कि अल्लाह तआला उन्हें लंबी उम्र, उत्तम स्वास्थ्य और निरंतर ख़िदमत की तौफ़ीक़ अता फरमाए तथा उनके इल्मी और तर्बियती फ़ैज़ को और अधिक आम करे। आमीन।
(यह लेखक के अपने विचार है लेखक मोहम्मद अली Journo Mirror के एडिटर एवं को-फाउंडर है)

