ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने राष्ट्रीय गीत के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026 का कड़ा विरोध करते हुए इसे संविधान, धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक स्वतंत्रता के विरुद्ध बताया है।
बोर्ड का कहना है कि वंदे मातरम को कानूनी रूप से लागू करना और उसके कथित अपमान को दंडनीय अपराध बनाना नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
AIMPLB के प्रवक्ता डॉ. एस.क्यू.आर. इलियास ने कहा कि मुसलमान अपने देश से गहरा प्रेम करते हैं, लेकिन इस्लाम की मान्यताओं के अनुसार देश को देवी या देवता के रूप में नहीं देख सकते। उन्होंने कहा कि देशभक्ति और मातृभूमि की पूजा दो अलग-अलग अवधारणाएं हैं तथा किसी नागरिक की देशभक्ति का आकलन इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि वह कोई विशेष गीत गाता है या नहीं।
बोर्ड ने संविधान के अनुच्छेद 19 और 25 का हवाला देते हुए कहा कि प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अपने धर्म का पालन करने का अधिकार प्राप्त है।
AIMPLB ने सुप्रीम कोर्ट के बिजो इमैनुअल बनाम केरल राज्य फैसले का भी उल्लेख करते हुए कहा कि अदालत ने स्पष्ट किया था कि धार्मिक मान्यताओं के कारण सम्मानपूर्वक किसी गीत में भाग न लेना अनादर नहीं माना जा सकता।
AIMPLB का कहना है कि वंदे मातरम के कुछ हिस्सों में मातृभूमि को देवी के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो इस्लाम के तौहीद (एकेश्वरवाद) के सिद्धांत के विपरीत है।
बोर्ड ने यह भी कहा कि संविधान सभा ने राष्ट्रीय स्तर पर केवल पहले दो छंदों को स्वीकार किया था और शेष अंशों में धार्मिक संदर्भ होने के कारण उन्हें समान रूप से स्वीकार नहीं किया गया।
बोर्ड ने केंद्र सरकार से बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, गरीबी और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने की अपील की। साथ ही कहा कि धार्मिक और भावनात्मक विवाद खड़े करने के बजाय संविधान की सर्वोच्चता, समानता और नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करना लोकतंत्र और देशहित के लिए अधिक आवश्यक है।

