नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि किसी भी विदेशी नागरिक को तब तक उसके गृह देश नहीं भेजा जा सकता, जब तक संबंधित देश उसकी राष्ट्रीयता की पुष्टि न कर दे और उसे स्वीकार करने पर सहमत न हो। गृह मंत्रालय (एमएचए) ने यह बात सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक हलफनामे में कही है।
यह हलफनामा असम में विदेशी घोषित किए गए लोगों को लंबे समय तक हिरासत में रखे जाने के खिलाफ दायर याचिका के जवाब में दाखिल किया गया। गृह मंत्रालय ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति की राष्ट्रीयता स्पष्ट नहीं है या संबंधित देश उसकी नागरिकता की पुष्टि नहीं करता, तो उसके निर्वासन की प्रक्रिया शुरू ही नहीं की जा सकती।
मंत्रालय के अनुसार, निर्वासन के लिए वैध यात्रा दस्तावेज और संबंधित देश की स्वीकृति भी अनिवार्य है। हलफनामे में यह भी कहा गया है कि किसी व्यक्ति को केवल तब ही निर्वासित किया जा सकता है, जब उसके खिलाफ चल रही सभी अदालती कार्यवाही या सजा पूरी हो चुकी हो।
इसके अलावा संबंधित व्यक्ति के पास वैध पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेज होना चाहिए और उस पर कोई अन्य आपराधिक मामला लंबित नहीं होना चाहिए। गृह मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि संबंधित देश के दूतावास या उच्चायोग से यात्रा दस्तावेज प्राप्त करना निर्वासन प्रक्रिया का आवश्यक हिस्सा है।
केंद्र सरकार का यह रुख ऐसे समय सामने आया है जब कथित अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों को लेकर चल रही “पुशबैक” कार्रवाई पर सवाल उठ रहे हैं। हाल के महीनों में कई रिपोर्टों में आरोप लगाया गया कि कुछ लोगों को कानूनी प्रक्रिया पूरी किए बिना सीमा पार बांग्लादेश भेजने की कोशिश की गई।
बांग्लादेश ने भी भारत पर ऐसे कई मामलों में आपत्ति जताते हुए कहा था कि किसी भी व्यक्ति की वापसी केवल स्थापित राजनयिक और कानूनी प्रक्रिया के तहत ही होनी चाहिए।
पहलगाम हमले के बाद कई राज्यों में कथित अवैध प्रवासियों की पहचान के लिए अभियान तेज किए गए हैं। इस दौरान कुछ ऐसे मामले भी सामने आए, जिनमें बाद में संबंधित लोगों के भारतीय नागरिक होने या उनके नागरिकता संबंधी मामले अदालतों में लंबित होने की जानकारी मिली।
इस कारण “पुशबैक” अभियान को लेकर कानूनी और मानवाधिकार संबंधी बहस भी तेज हो गई है। इसी बीच असम सरकार ने विधानसभा में बताया कि पिछले दो वर्षों में निर्वासन, निष्कासन और “पुशबैक” की विभिन्न प्रक्रियाओं के तहत 1,679 लोगों को बांग्लादेश भेजा गया।
वहीं, कई मानवाधिकार संगठनों और आलोचकों का कहना है कि असम और पश्चिम बंगाल में कथित अवैध प्रवासियों की पहचान की प्रक्रिया का प्रभाव बंगाली भाषी मुसलमानों पर असमान रूप से पड़ा है। सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार का ताज़ा हलफनामा इस पूरे मुद्दे पर कानूनी प्रक्रिया और निर्वासन के नियमों को स्पष्ट करने वाला महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जा रहा है।

