इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस्लाम धर्म अपनाने वाली दो वयस्क बहनों की वर्षों तक कथित अवैध कैद के मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि माता-पिता की इच्छा, सामाजिक रूढ़िवादिता या बहुसंख्यक भावना किसी वयस्क व्यक्ति के संवैधानिक अधिकारों पर हावी नहीं हो सकती।
अदालत ने दोनों महिलाओं को 25 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने उनकी स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के लिए उनके पिता और उत्तर प्रदेश सरकार को संयुक्त रूप से जिम्मेदार ठहराया है। दोनों महिलाओं के बीच मुआवजे की राशि बराबर बांटी जाएगी और भुगतान आठ सप्ताह के भीतर करना होगा।
मामला दो बहनों का है, जिन्होंने वर्ष 2020 में अपनी इच्छा और अंतरात्मा के अनुसार हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपनाया था। आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार, दीया भाटिया ने अपना नाम ज़ोया दीया भाटिया, जबकि अंशु भाटिया ने अमीना अंशु भाटिया रखा।
याचिका के मुताबिक, दोनों महिलाएं वयस्क और शिक्षित हैं। उन्होंने अपनी पसंद से धर्म अपनाने और विवाह करने का फैसला किया था। आरोप है कि उनके पिता ने उनके फैसले का विरोध करते हुए पुलिस से संपर्क किया और उन्हें रोकने के लिए अपहरण का मामला दर्ज कराया। बाद में मामले में उत्तर प्रदेश के धर्मांतरण विरोधी कानून की धाराएं भी जोड़ी गईं।
अदालत ने पाया कि दोनों महिलाएं वर्ष 2021 से लंबे समय तक अपनी स्वतंत्रता से वंचित रहीं। कोर्ट ने कहा कि राज्य तंत्र उनकी रिहाई सुनिश्चित करने के बजाय आपराधिक कार्यवाही के “स्पष्ट आवरण” में उनकी कथित कैद को जारी रहने देता रहा।
अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं है जिससे यह साबित हो कि महिलाओं ने दबाव, धोखाधड़ी, अनुचित प्रभाव या प्रलोभन के कारण इस्लाम अपनाया था। दोनों महिलाओं ने अदालत के सामने लगातार कहा कि उनका धर्म परिवर्तन आध्यात्मिक संतुष्टि, मानसिक शांति और अंतरात्मा की स्वतंत्रता से प्रेरित था।
हाईकोर्ट ने कहा कि वयस्क व्यक्ति को अपने जीवन की दिशा तय करने का संवैधानिक अधिकार है। इसमें धर्म, रहने की जगह और अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने का फैसला भी शामिल है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि ये स्वतंत्रताएं संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा अनुच्छेद 25 के तहत अंतरात्मा की स्वतंत्रता से जुड़ी हैं।
कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि यह मान भी लिया जाए कि धर्म परिवर्तन से जुड़े किसी कानून का उल्लंघन हुआ है, तब भी किसी पिता या परिवार को वयस्क महिलाओं को उनकी इच्छा के विरुद्ध कैद करने का अधिकार नहीं मिल जाता।

