बंगाली भाषी प्रवासी मजदूरों के खिलाफ बेंगलुरु पुलिस की कथित “अवैध अप्रवासी सत्यापन” कार्रवाई को लेकर नागरिक संगठनों ने गंभीर सवाल उठाए हैं। PUCL, AILAJ, DWRU, AICCTU, NND और अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं की संयुक्त तथ्य-जांच रिपोर्ट में पुलिस पर बंगाली भाषी प्रवासी मजदूरों को निशाना बनाने, भाषाई और वर्गीय भेदभाव करने, मारपीट तथा मनमाने ढंग से हिरासत में लेने के आरोप लगाए गए हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, 8 अगस्त से बेंगलुरु के कम से कम 10 से 12 थाना क्षेत्रों में पुलिस ने समन्वित अभियान चलाया। आरोप है कि पुलिसकर्मी सुबह-सुबह प्रवासी मजदूरों की बस्तियों में पहुंचे और पुरुषों, महिलाओं, बच्चों तथा बुजुर्गों को हिरासत में लेकर पुलिस थानों के बजाय विवाह हॉल, धर्मशालाओं और सम्मेलन केंद्रों में ले गए। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि कई लोगों को 10 से 12 घंटे तक वहां रखा गया। कुछ लोगों के पास आधार और पैन कार्ड जैसे दस्तावेज होने के बावजूद उन्हें हिरासत में लिए जाने का आरोप है।
संयुक्त जांच दल ने कुछ इलाकों में पुलिस पर हिरासत में लिए गए लोगों के साथ मारपीट करने और बस्तियों में प्रवेश के दौरान गेट तथा सीसीटीवी कैमरे तोड़ने का आरोप लगाया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि कई लोगों के मोबाइल फोन जब्त कर उनकी तलाशी ली गई। महिलाओं, छोटे बच्चों और नवजात शिशुओं को भी हिरासत में लिए जाने का दावा किया गया है। कुछ महिलाओं ने बताया कि उनके छोटे बच्चे घंटों घर पर अकेले रहे, जबकि नवजात बच्चों के साथ हिरासत में पहुंची महिलाओं को स्तनपान के लिए सुरक्षित और अलग स्थान तक उपलब्ध नहीं कराया गया।
रिपोर्ट में सत्यापन प्रक्रिया को भी असंगत और मनमाना बताया गया है। आरोप है कि अलग-अलग पुलिस थानों में अलग-अलग दस्तावेज मांगे गए और कई मामलों में आधार तथा मतदाता पहचान पत्र को अपर्याप्त या अमान्य बताया गया। एक मामले में लोगों को भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए राष्ट्रगान गाने के लिए मजबूर किए जाने का भी दावा किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, हिरासत में लिए गए लोगों को वकीलों से मिलने से रोका गया और कई घंटों तक शौचालय के इस्तेमाल पर भी प्रतिबंध लगाया गया। सामाजिक कार्यकर्ताओं और वकीलों को भी कथित तौर पर हिरासत में लिए गए लोगों से मिलने नहीं दिया गया।
संयुक्त रिपोर्ट में कहा गया है कि केवल किसी व्यक्ति के बंगाली भाषी होने, प्रवासी मजदूर होने, गरीब होने या अनौपचारिक बस्ती में रहने के आधार पर उसे विदेशी नागरिक नहीं माना जा सकता। रिपोर्ट में संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का हवाला देते हुए कहा गया कि राज्य द्वारा किया गया कोई भी वर्गीकरण तार्किक और कानूनी आधार पर होना चाहिए। संगठनों ने आरोप लगाया कि अभियान मुख्य रूप से मजदूर वर्ग की बंगाली भाषी बस्तियों तक सीमित रहा, जबकि अपार्टमेंट परिसरों में रहने वाले बंगाली भाषी लोगों को इसी तरह निशाना नहीं बनाया गया। इसे भाषाई और वर्गीय प्रोफाइलिंग बताया गया है।
रिपोर्ट में मेनका गांधी बनाम भारत संघ समेत सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा गया है कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित करने वाली सरकारी कार्रवाई निष्पक्ष, न्यायसंगत और तर्कसंगत प्रक्रिया के तहत होनी चाहिए। संगठनों का कहना है कि “सत्यापन” के नाम पर किसी व्यक्ति को घंटों हिरासत में रखना संवैधानिक सुरक्षा उपायों से बचने का तरीका नहीं हो सकता। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि विदेशी नागरिकता के संदेह मात्र के आधार पर कार्रवाई नहीं की जा सकती और इसके लिए ठोस साक्ष्य तथा उचित कानूनी प्रक्रिया जरूरी है।
संयुक्त संगठनों ने कर्नाटक सरकार और पुलिस से सत्यापन अभियान का कानूनी आधार, लिखित आदेश और मानक संचालन प्रक्रिया सार्वजनिक करने की मांग की है। साथ ही पुलिस कार्रवाई के दौरान मारपीट, धमकी, जबरदस्ती और कथित गैरकानूनी हिरासत के आरोपों की स्वतंत्र जांच कराने, हिरासत में रखे गए लोगों की जानकारी सार्वजनिक करने और उन्हें तत्काल कानूनी सहायता उपलब्ध कराने की मांग की गई है। रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि राज्य को आव्रजन कानून लागू करने का अधिकार है, लेकिन भाषा, वर्ग, पेशे, मूल स्थान या बस्ती में रहने के आधार पर किसी व्यक्ति को सामूहिक संदेह और भेदभाव का निशाना नहीं बनाया जा सकता।

