Journo Mirror
India

सूरत में ध्वस्तीकरण पीड़ितों का गुजरात हाईकोर्ट में दावा, ‘अच्छे घरों’ की जगह जर्जर मकान दिए जा रहे

सूरत: गुजरात के सूरत स्थित नासिरनगर में जून में हुई ध्वस्तीकरण कार्रवाई से प्रभावित परिवारों ने गुजरात हाईकोर्ट में पुनर्वास को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। पीड़ितों का कहना है कि सरकार ने पहले जिन घरों में पुनर्वास का प्रस्ताव दिया था, बाद में वह स्थान बदलकर अडाजन और भेस्तान कर दिया गया और वहां प्रस्तावित मकान कथित तौर पर जर्जर हालत में हैं।

सोमवार, 31 अगस्त को मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकील ने अदालत को बताया कि प्रभावित परिवारों को शुरुआत में जहांगीरपुरा में प्रधानमंत्री आवास योजना (PM Awas Yojana) के तहत मकान दिखाए गए थे। परिवारों ने इन मकानों को देखा था और पुनर्वास के प्रस्ताव पर सहमति भी जताई थी। इनमें 1-BHK फ्लैट देने का प्रस्ताव शामिल था।

हालांकि, याचिकाकर्ताओं के अनुसार बाद में सरकार ने पुनर्वास की जगह बदल दी और अडाजन तथा भेस्तान में मकान देने का प्रस्ताव रखा। पीड़ित परिवारों ने हाईकोर्ट के सामने इन मकानों की तस्वीरें भी पेश कीं। उनका दावा है कि नए प्रस्तावित मकान जर्जर हालत में हैं और उनमें एक छोटे कमरे तथा रसोई के अलावा पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं।

मामले में सूरत नगर निगम की ओर से यह दावा किया गया कि प्रभावित परिवार मकानों के आवंटन के लिए आयोजित लॉटरी प्रक्रिया के दौरान मौजूद नहीं थे। हालांकि, याचिकाकर्ताओं के वकील ने इस दावे को खारिज करते हुए अदालत को बताया कि उनके पास वीडियो साक्ष्य मौजूद हैं, जिनसे पता चलता है कि प्रभावित परिवार लॉटरी प्रक्रिया में मौजूद थे।

सरकार के वकील ने इन दावों का विरोध किया और कहा कि लॉटरी प्रक्रिया में प्रभावित परिवारों के अलावा अन्य लोग भी शामिल हुए थे। सरकार ने याचिकाकर्ताओं की ओर से दाखिल हलफनामे पर जवाब देने के लिए अदालत से समय भी मांगा।

याचिकाकर्ताओं ने अदालत से अनुरोध किया कि मामले की सुनवाई उसी न्यायाधीश के समक्ष जारी रखी जाए, ताकि वही न्यायाधीश मामले पर अंतिम फैसला सुना सकें। हाईकोर्ट ने अनुरोध स्वीकार करते हुए मामले को पार्ट-हर्ड रखने का निर्देश दिया। मामले की अगली सुनवाई आने वाले दिनों में होगी।

यह विवाद नासिरनगर में हुई ध्वस्तीकरण कार्रवाई को लेकर पहले से चल रही न्यायिक कार्यवाही के बाद सामने आया है। हाईकोर्ट ने पहले कहा था कि यदि ध्वस्तीकरण अवैध तरीके से किया गया पाया जाता है तो प्रभावित लोगों के पुनर्वास की जिम्मेदारी और खर्च अधिकारियों को उठाना होगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि पुनर्वास का खर्च प्रभावित परिवारों या याचिकाकर्ताओं से नहीं वसूला जा सकता।

सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि सूरत नगर निगम और पुलिस अधिकारियों की भूमिका की जांच के लिए गठित उच्चस्तरीय समिति अपनी रिपोर्ट 18 सितंबर तक सौंप सकती है।

Related posts

Leave a Comment