कोलकाता: पश्चिम बंगाल के उत्तर दिनाजपुर जिले में 66 वर्षीय मुस्लिम दिहाड़ी मजदूर को कथित तौर पर बांग्लादेशी नागरिक बताकर जेल में बंद किए जाने का मामला सामने आया है। मानवाधिकार संगठन बांग्लार मानवाधिकार सुरक्षा मंच (MASUM) ने मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC), सुप्रीम कोर्ट और पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ अधिकारियों से स्वतंत्र जांच की मांग की है।
MASUM के मुताबिक, व्यक्ति की पहचान जलील अख्तर, पिता स्वर्गीय रौशन अली, निवासी बगराइल गांव, डालखोला थाना क्षेत्र के रूप में हुई है। संगठन का आरोप है कि 19 और 20 जुलाई 2026 की दरमियानी रात जलील अख्तर को उनके घर से उठाया गया और औपचारिक आपराधिक मामला दर्ज होने से पहले भी उन्हें हिरासत में रखा गया। बाद में उन्हें बांग्लादेशी नागरिक बताते हुए उनके खिलाफ मामला दर्ज किया गया।
मानवाधिकार संगठन का दावा है कि जलील अख्तर के पास वोटर आईडी, आधार कार्ड और राशन कार्ड जैसे भारतीय पहचान दस्तावेज मौजूद हैं। इसके अलावा उनका नाम कथित तौर पर 2002 की मतदाता सूची में भी दर्ज है और उनके पिता व दादा के नाम पुराने चुनावी रिकॉर्ड में मौजूद हैं। MASUM के अनुसार, जलील ने 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भी मतदान किया था और उपलब्ध जानकारी के मुताबिक उन्होंने कभी बांग्लादेश या किसी अन्य विदेशी देश की यात्रा नहीं की।
MASUM ने पुलिस रिकॉर्ड में जलील अख्तर की पहचान से संबंधित कथित विसंगतियों पर भी सवाल उठाए हैं। संगठन के मुताबिक, सब-इंस्पेक्टर टोटन देबनाथ की ओर से तैयार रिपोर्ट में आरोपी का नाम “जलील अख्तर (70)” बताते हुए उसे बांग्लादेश के ठाकुरगांव जिले के हरिपुर थाना क्षेत्र का निवासी बताया गया है। वहीं, परिवार और संगठन के अनुसार हिरासत में लिए गए व्यक्ति की उम्र करीब 66 वर्ष है और वह उत्तर दिनाजपुर के बगराइल गांव का रहने वाला है।
संगठन का कहना है कि पिता का नाम, उम्र, पता और राष्ट्रीयता जैसे महत्वपूर्ण विवरणों में अंतर को महज टाइपिंग या रिकॉर्ड की गलती मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। MASUM ने सभी दस्तावेजों और कथित तौर पर ग्राम पंचायत प्रधान से प्राप्त प्रमाण-पत्र या घोषणा की स्वतंत्र जांच की मांग की है।
MASUM ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया है कि जलील अख्तर को भारत-बांग्लादेश सीमा के एक सुनसान हिस्से की ओर ले जाया गया, जहां कथित तौर पर उन्हें बांग्लादेश की ओर धकेलने की कोशिश की गई। संगठन का कहना है कि इस दौरान पुलिस या खुफिया अधिकारियों और सीमा सुरक्षा बल (BSF) के जवानों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए।
हालांकि, MASUM ने स्पष्ट किया है कि सीमा पार धकेले जाने से संबंधित आरोप अभी स्वतंत्र रूप से साबित नहीं हुए हैं और इसी वजह से संगठन ने पूरे मामले की स्वतंत्र जांच की मांग की है। कथित घटना के बाद जलील को वापस लाकर इस्लामपुर पुलिस अधिकारियों को सौंपे जाने की बात कही गई है।
डालखोला थाने में 21 जुलाई 2026 को केस नंबर 212/2026 दर्ज किया गया। MASUM के मुताबिक, मामला Immigration and Foreigners Act, 2025 की धारा 21 के तहत दर्ज किया गया, जिसके बाद जलील अख्तर को औपचारिक रूप से गिरफ्तार किया गया। संगठन ने यह भी सवाल उठाया है कि औपचारिक गिरफ्तारी से पहले उन्हें कितने समय तक हिरासत में रखा गया और क्या उस अवधि का सही रिकॉर्ड तैयार किया गया।
MASUM का कहना है कि जमानत सुनवाई के दौरान इस्लामपुर के मजिस्ट्रेट ने पुलिस को जलील द्वारा पेश किए गए दस्तावेजों की सत्यता जांचने का निर्देश दिया था। संगठन ने आरोप लगाया कि जांच अधिकारी सब-इंस्पेक्टर अधीर बर्मन ने सत्यापन रिपोर्ट पेश करने में कई सप्ताह लगाए।
मानवाधिकार संगठन ने जलील अख्तर की सेहत और जेल में उनकी स्थिति को लेकर भी चिंता जताई है। संगठन के मुताबिक, करीब 66 वर्षीय जलील को स्वास्थ्य संबंधी कई परेशानियां हैं और उन्हें कथित तौर पर मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं भी हैं। MASUM ने उनका स्वतंत्र मेडिकल परीक्षण और उचित इलाज कराने की मांग की है।
संगठन ने अधिकारियों से पुलिस डायरी, गिरफ्तारी और हिरासत के रिकॉर्ड, होल्डिंग सेंटर के रजिस्टर, CCTV फुटेज, मेडिकल रिकॉर्ड और पुलिस-खुफिया विभाग-BSF के बीच हुए संचार को सुरक्षित रखने की मांग की है। साथ ही यह भी जांच करने को कहा है कि कहीं किसी आधिकारिक रिकॉर्ड में जानबूझकर गलत जानकारी तो दर्ज नहीं की गई।
MASUM ने कहा है कि जलील अख्तर की राष्ट्रीयता का निर्धारण कानूनी, निष्पक्ष और उचित प्रक्रिया के तहत किया जाना चाहिए। संगठन ने यह भी मांग की है कि जब तक उनकी नागरिकता को लेकर तथ्यात्मक और कानूनी स्थिति स्पष्ट न हो, तब तक उन्हें भारत से बाहर भेजने या सीमा पार करने के किसी भी प्रयास पर रोक लगाई जाए। संगठन के मुताबिक, यह मामला केवल एक व्यक्ति की नागरिकता का विवाद नहीं, बल्कि सीमा क्षेत्रों में लोगों की पहचान और उनके मौलिक अधिकारों से जुड़ा गंभीर सवाल भी उठाता है।

