नई दिल्ली: भारत में मॉब लिंचिंग की घटनाओं और उनके सामाजिक-राजनीतिक प्रभावों पर केंद्रित किताब ‘अख़लाक़: भारत में मॉब लिंचिंग की विस्तृत ज़मीनी पड़ताल’ पर 3 सितंबर को नई दिल्ली स्थित जवाहर भवन में परिचर्चा आयोजित की गई। कार्यक्रम में वरिष्ठ लेखक, साहित्यकार, पत्रकार, वकील, सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिक हस्तियां मौजूद रहीं। किताब के लेखक दयाशंकर मिश्र ने इसे देश के अलग-अलग हिस्सों में मुसलमानों के साथ-साथ ईसाइयों और दलितों के खिलाफ दमन, हिंसा और मॉब लिंचिंग की ग्राउंड रिपोर्टिंग बताया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि और लेखक अशोक वाजपेयी ने की। उन्होंने मॉब लिंचिंग की संस्कृति, समाज और हिंदी पट्टी की मानसिकता पर अपनी बात रखी। परिचर्चा में शिक्षाविद् और लेखक पुरुषोत्तम अग्रवाल, इतिहासकार प्रोफेसर एस. इरफ़ान हबीब, वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण, सांसद प्रोफेसर मनोज कुमार झा, वरिष्ठ पत्रकार आनंद वर्धन और पत्रकार बुशरा खानम सहित कई प्रमुख लोगों ने किताब पर अपने विचार रखे।
वरिष्ठ पत्रकार और लेखिका भाषा सिंह ने परिचर्चा का संचालन करते हुए किताब की विषयवस्तु और उसके संदर्भों पर विस्तार से चर्चा की। वहीं कवि-लेखक गौहर रज़ा और प्रोफेसर जोया हसन की मौजूदगी को लेखक ने अपने लिए उत्साहवर्धक बताया। किताब की प्रस्तावना प्रसिद्ध डॉक्यूमेंट्री फिल्मकार आनंद पटवर्धन ने लिखी है। कार्यक्रम में वरिष्ठ राजनेता दिग्विजय सिंह, मोहन प्रकाश, सुप्रिया श्रीनेत, गुरदीप सप्पल और प्रोफेसर रतनलाल भी मौजूद रहे।
लेखक दयाशंकर मिश्र ने कहा कि मॉब लिंचिंग केवल किसी एक व्यक्ति या समुदाय पर हमला नहीं, बल्कि भारतीय संविधान और समाज पर सामूहिक हमला है। उन्होंने कहा कि इस तरह के हमले का अकेले मुकाबला नहीं किया जा सकता और समाज, संवैधानिक संस्थाओं, विपक्ष तथा लेखकों को मिलकर इसके खिलाफ आवाज़ उठानी होगी। उनके मुताबिक, ‘अख़लाक़’ नफरत में डूबते समाज को पीड़ा और प्रायश्चित के करीब ले जाने का एक विनम्र प्रयास है।
मिश्र ने बताया कि किताब को प्रकाशित करने के लिए शुरुआत में प्रकाशकों की ओर से भी इनकार का सामना करना पड़ा। इसके बाद ‘द ट्रुथ पिल’ के लेखक दिनेश ठाकुर ने किताब के प्रकाशन में सहयोग किया। उन्होंने महाराष्ट्र के सोलापुर से आए इतिहास अध्येता सरफ़राज़ अहमद, ओडिशा के अमिया पांडव और डॉ. पल्लव लिमा सहित उन लोगों का भी आभार जताया, जिन्होंने मॉब लिंचिंग, चर्चों और ईसाइयों पर हमलों तथा आदिवासियों पर अत्याचार से जुड़े मामलों की जानकारी जुटाने में सहयोग किया।
लेखक ने कहा कि वह अब ‘अख़लाक़’ के साथ विभिन्न शहरों में मॉब लिंचिंग पर नागरिक संवाद के लिए यात्रा शुरू कर रहे हैं। उन्होंने सुधी नागरिकों और यूट्यूब चैनलों से अपील की कि किताब में दर्ज पीड़ा, यातना और अत्याचार की दास्तान को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने में सहयोग करें।

