जहाँ एक महीने से चली आ रही अपेक्षाकृत शांति के बाद हाल के दिनों में ईरान और अमेरिका के बीच फिर से गोलीबारी शुरू होने से होर्मुज़ जलडमरूमध्य में तनावपूर्ण स्थिति दोबारा पैदा हो गई है, वहीं नई रिपोर्टों और विश्लेषणों से पता चलता है कि, वॉशिंगटन इस युद्ध में गंभीर और लगातार बढ़ती चुनौतियों का सामना कर रहा है।
अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी फ़ार्स के अनुसार, समाचार नेटवर्क सीएनएन ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य में एक महीने से चली आ रही संघर्ष की शांति, जो ईरान और अमेरिका के बीच भारी गोलीबारी के बाद बनी थी, इस सप्ताह दोनों पक्षों के नए हमलों के साथ समाप्त हो गई। इससे क्षेत्र एक बार फिर अस्थिर और खतरनाक स्थिति में पहुँच गया है।
हालाँकि ऐसा लगता है कि दोनों ही पक्ष दोबारा पूरी तरह से युद्ध में लौटना नहीं चाहते, लेकिन सैन्य और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा स्थिति बेहद नाज़ुक है और किसी भी तरह की ग़लत गणना एक नई और विनाशकारी स्थिति पैदा कर सकती है। हालांकि, हाल के दिनों में जो बात पहले से अधिक स्पष्ट हुई है, वह है ईरान के साथ युद्ध के कारण अमेरिका के सामने आने वाली भारी लागत और अभूतपूर्व चुनौतियाँ।
ट्रंप से व्यापक असंतोष; लोकप्रियता सबसे निचले स्तर पर पहुँची
व्हाइट हाउस के सामने मौजूद सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक अमेरिकी जनता के बीच डोनाल्ड ट्रंप की लोकप्रियता में तेज़ गिरावट है।
मैसाचुसेट्स विश्वविद्यालय द्वारा जारी एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि दो-तिहाई से अधिक अमेरिकी नागरिक ईरान के साथ युद्ध को लेकर ट्रंप के तरीक़े से असंतुष्ट हैं। इस सर्वेक्षण के अनुसार, राष्ट्रपति की कुल लोकप्रियता घटकर 32 प्रतिशत रह गई है। किसी भी सरकार के लिए यह आँकड़ा गंभीर चेतावनी माना जाता है।
यह असंतोष मुख्य रूप से युद्ध के कारण अमेरिकी नागरिकों के रोज़मर्रा के जीवन पर सीधे पड़ने वाले प्रभाव के कारण है। पेट्रोल की कीमतों में तेज़ बढ़ोतरी इसका एक प्रमुख उदाहरण है।
अमेरिका में पेट्रोल की औसत क़ीमत बढ़कर 4.14 डॉलर प्रति गैलन हो गई है, जबकि पिछले साल यह 3.19 डॉलर प्रति गैलन थी। यह बढ़ोतरी अमेरिकी परिवारों के बजट पर काफी दबाव डाल रही है।
अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस भी युद्ध ख़त्म होने या पेट्रोल की क़ीमतों के युद्ध से पहले के स्तर पर लौटने की कोई निश्चित समय-सीमा नहीं बता सके। इस तरह उन्होंने व्यावहारिक रूप से इस संकट के अंत का फैसला ईरान पर छोड़ दिया।
हथियारों के भंडार खाली होने लगे; ऐसी चेतावनी जिसे गंभीरता से नहीं लिया गया
इस युद्ध में अमेरिका के सामने एक और बड़ी चुनौती रणनीतिक हथियारों और गोला-बारूद की अभूतपूर्व खपत है।
विश्वसनीय रिपोर्टों के अनुसार, ईरान के साथ युद्ध शुरू होने के बाद से अमेरिकी सेना ने अपनी THAAD मिसाइल रक्षा प्रणाली की लगभग चार-पाँचवाँ हिस्सा मिसाइलें और पैट्रियट प्रणाली के लगभग आधे इंटरसेप्टर इस्तेमाल कर लिए हैं।
इसके अलावा, सीएनएन से बातचीत करने वाले जानकार सूत्रों के अनुसार, एक महत्वपूर्ण मिसाइल रक्षा प्रणाली में इस्तेमाल होने वाले इंटरसेप्टर का भंडार भी 20 प्रतिशत से नीचे चला गया है।
ये आँकड़े ऐसे समय सामने आए हैं जब डोनाल्ड ट्रंप पहले दावा कर चुके हैं कि अमेरिका के पास गोला-बारूद की “बहुत बड़ी मात्रा” मौजूद है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया था कि कुछ प्रकार के हथियारों की कमी अधिक गंभीर है।
यह विरोधाभास अमेरिकी हथियार आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ रहे गंभीर दबाव को दिखाता है। इस स्थिति को लेकर अमेरिकी सैन्य कमांडर बेहद चिंतित हैं।
द वॉशिंगटन पोस्ट ने जानकार सूत्रों के हवाले से प्रकाशित एक रिपोर्ट में बताया कि, अमेरिका के कई वरिष्ठ सैन्य कमांडरों ने रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ को चेतावनी दी है कि, ईरान के ख़िलाफ़ व्यापक सैन्य अभियान जारी रखना असहनीय होता जा रहा है।
उनका कहना है कि, इससे दुनिया के अन्य हिस्सों में संभावित ख़तरों से निपटने की अमेरिका की क्षमता बुरी तरह कमजोर हो जाएगी। ये चेतावनियाँ बताती हैं कि, अमेरिकी सेना अपनी क्षमता की सीमा के क़रीब पहुँच रही है और अगर युद्ध इसी तरह जारी रहा, तो इसके गंभीर और अपूरणीय परिणाम हो सकते हैं।
युद्ध की 40 अरब डॉलर की लागत; वास्तविकता जिसे ट्रंप नकारते हैं
ईरान के साथ युद्ध केवल हथियारों और गोला-बारूद तक सीमित नहीं है। इसकी आर्थिक लागत भी बहुत बड़ी है। अनुमानों के अनुसार, जुलाई तक ईरान के साथ युद्ध में अमेरिका के सरकारी ख़ज़ाने पर लगभग 40 अरब डॉलर का ख़र्च आ चुका था।
यह ख़र्च ऐसे समय बढ़ रहा है जब ट्रंप सरकार, बढ़ती क़ीमतों को नियंत्रित करने के लिए अपने रणनीतिक तेल भंडार का इस्तेमाल जारी रख रही है। परिणामस्वरूप, इन रणनीतिक तेल भंडारों में मौजूद तेल की मात्रा 1983 के बाद के सबसे निचले स्तर पर पहुँच गई है।
इन वास्तविकताओं के बावजूद अमेरिकी राष्ट्रपति अपने आक्रामक रुख पर कायम हैं।
ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर एक संदेश में लिखा कि, वह अमेरिका की मौजूदा स्थिति को — जिसमें होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर लगभग पूरा नियंत्रण और ईरान की अर्थव्यवस्था का पतन शामिल है — कहीं अधिक पसंद करते हैं।
हालाँकि, वह इस कथित जीत की घरेलू क़ीमत को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं। यह लागत अब स्पष्ट रूप से उनकी लोकप्रियता और अमेरिका की आर्थिक स्थिरता पर असर डाल रही है।
रणनीतिक असहमति; अमेरिका का नियंत्रण का प्रयास और गतिरोध तोड़ने की ईरान की कोशिश
विशेषज्ञों का मानना है कि तनाव बढ़ने का एक प्रमुख कारण दोनों पक्षों की रणनीतियों में गहरा अंतर है। ऐसा लगता है कि अमेरिका मौजूदा स्थिति को नियंत्रित करने, सैन्य तनाव को बढ़ने से रोकने और संघर्ष को मुख्य रूप से आर्थिक क्षेत्र तक सीमित रखने की कोशिश कर रहा है। इसके विपरीत, ईरान बिल्कुल अलग रणनीति अपना रहा है।
इस्राईल की सैन्य ख़ुफ़िया एजेंसी में ईरान शाखा के पूर्व प्रमुख डैनी सिट्रीनॉविच ने इस बारे में लिखा कि “ईरान तेल टैंकरों की आवाजाही को बाधित करने और होर्मुज़ जलडमरूमध्य में अमेरिका द्वारा नई स्थिति बनाने की कोशिश को चुनौती देने का प्रयास जारी रखेगा।”
उन्होंने यह भी कहा कि हालांकि ईरान और अमेरिका दोनों नियंत्रण से बाहर होने वाले तनाव के ख़तरों को समझते हैं, फिर भी दोनों तनाव बढ़ाने की सीढ़ी पर आगे बढ़ते जा रहे हैं। यह नाज़ुक संतुलन संभवतः लंबे समय तक क़ायम नहीं रह पाएगा।
इसी बीच, इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप के एक वरिष्ठ विशेषज्ञ ने सीएनएन से कहा कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य में ईरान द्वारा आवाजाही में बाधा डालना और ईरान पर अमेरिका का आर्थिक दबाव “दोनों पक्षों के लिए लगातार असहनीय होता जा रहा है।”
उन्होंने कहा कि “दोनों में से कोई भी पक्ष पूरी तरह से युद्ध में वापस नहीं जाना चाहता”, लेकिन परिस्थितियाँ इस तरह आगे बढ़ रही हैं कि दोनों पक्ष अनजाने में फिर से पूर्ण युद्ध की ओर धकेले जा सकते हैं।
क्या अमेरिका हार की सीमा के क़रीब पहुँच रहा है?
इन सभी कारकों — राष्ट्रपति की घटती लोकप्रियता, पेट्रोल की बढ़ती कीमतें, हथियारों के भंडार का खाली होना, सैन्य कमांडरों की चेतावनियाँ और युद्ध की भारी आर्थिक लागत — से पता चलता है कि, अमेरिका एक ऐसे घिसटते हुए युद्ध में फँस गया है, जिसका न तो कोई स्पष्ट परिणाम सामने आया है और न ही कोई स्पष्ट उपलब्धि मिली है। इसके बजाय यह युद्ध धीरे-धीरे अमेरिका की सैन्य और आर्थिक क्षमता को कमज़ोर कर रहा है।
ट्रंप भले ही होर्मुज़ जलडमरूमध्य में मिली सामरिक सफलताओं पर ज़ोर देते रहें, लेकिन ज़मीनी वास्तविकता यह दिखाती है कि ईरान के साथ युद्ध उनके प्रशासन के लिए एक बड़े संकट में बदल गया है। यह संकट हर दिन और अधिक गंभीर होता जा रहा है और फिलहाल इससे बाहर निकलने का कोई स्पष्ट जवाब दिखाई नहीं दे रहा है।
(यह लेखक के अपने विचार है लेखक रिज़वान हैदर मिडिल ईस्ट के जानकार है)

