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मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने किया UCC का विरोध, संविधान के खिलाफ बताया

All India Muslim Personal Law Board (AIMPLB) ने उत्तराखंड और गुजरात में लागू/प्रस्तावित Uniform Civil Code (UCC) का कड़ा विरोध करते हुए इसे “संवैधानिक रूप से अस्थिर और राजनीतिक रूप से प्रेरित” करार दिया है।

दिल्ली में जारी प्रेस विज्ञप्ति में बोर्ड ने कहा कि गुजरात विधानसभा द्वारा पारित UCC बिल और उत्तराखंड में लागू कानून संविधान की मूल भावना के खिलाफ हैं।

AIMPLB के अनुसार, यह कानून धार्मिक स्वतंत्रता, समानता और व्यक्तिगत आजादी जैसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।

बोर्ड ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 44 के तहत UCC केवल नीति निदेशक तत्व है, जिसे मौलिक अधिकारों की तरह सीधे लागू नहीं किया जा सकता। AIMPLB का कहना है कि कोई भी समान नागरिक संहिता तभी सही मायनों में लागू मानी जाएगी, जब वह पूरे देश में समान रूप से लागू हो, जबकि गुजरात का कानून न तो पूरे देश में लागू है और न ही राज्य के भीतर सभी समुदायों पर समान रूप से लागू होता है।

प्रेस बयान में कहा गया कि “इस कानून को वास्तविक यूनिफॉर्म सिविल कोड नहीं कहा जा सकता, इसका नाम ही भ्रामक है।” बोर्ड ने यह भी याद दिलाया कि B. R. Ambedkar ने संविधान सभा में स्पष्ट किया था कि ऐसा कोई कानून जनता की सहमति के बिना नहीं थोपा जाएगा।

AIMPLB ने आरोप लगाया कि यह कानून अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलमानों पर बहुसंख्यक समाज के रीति-रिवाज थोपने की कोशिश है। बोर्ड के मुताबिक शादी, तलाक, विरासत और पारिवारिक कानून इस्लामी शरीयत का हिस्सा हैं और इनमें राज्य का हस्तक्षेप धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन है।

बोर्ड ने यह भी बताया कि उत्तराखंड UCC को हाईकोर्ट में चुनौती दी जा चुकी है और मामला फिलहाल विचाराधीन है। साथ ही, गुजरात सरकार की परामर्श प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा गया कि रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई, जिससे पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।

AIMPLB ने मांग की है कि उत्तराखंड और गुजरात में UCC के क्रियान्वयन पर तुरंत रोक लगाई जाए और इस पूरे मामले की व्यापक संवैधानिक समीक्षा की जाए। बोर्ड ने यह भी कहा कि भविष्य में किसी भी कानून को लागू करने से पहले सभी पक्षों से व्यापक चर्चा की जानी चाहिए।

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