दिल्ली पुलिस ने 338 सीसीटीवी कैमरे खरीदने के लिए 15.66 करोड़ रुपये का टेंडर जारी किया था। इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन (आईएफएफ) की 14 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, इन कैमरों में चेहरे की पहचान करने वाली तकनीक, भीड़ का पता लगाने और वाहनों की नंबर प्लेट पढ़ने जैसी सुविधाएं होंगी। खास बात यह है कि टेंडर में रामलीला मैदान और उसके आसपास के कई इलाके भी शामिल हैं, जिन्हें बाद में प्रदर्शन स्थलों के रूप में निर्धारित किया गया।
रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली पुलिस ने 11 अक्टूबर 2026 को जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाकर रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और शाहदरा के सीबीडी मैदान को नए प्रदर्शन स्थलों के रूप में नामित किया। आईएफएफ ने बताया कि रामलीला मैदान के वीआईपी गेट, दिल्ली गेट, तुर्कमान गेट और आसफ अली रोड सहित कई स्थानों पर कैमरे लगाने की योजना टेंडर में पहले से शामिल थी। हालांकि, संगठन ने स्पष्ट किया कि उसके पास दोनों फैसलों के बीच सीधे तालमेल का कोई सबूत नहीं है।
आईएफएफ के मुताबिक, टेंडर में 248 सामान्य कैमरे, 43 पैन-टिल्ट-जूम कैमरे और 47 वाहनों की नंबर प्लेट पढ़ने वाले कैमरे खरीदने का प्रस्ताव है। इन कैमरों में चेहरे की पहचान, लोगों की भीड़ का पता लगाने और उनकी संख्या गिनने जैसी सुविधाएं अनिवार्य की गई हैं। कैमरों में माइक्रोफोन और आवाज सुनने की सुविधा का भी उल्लेख है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत मोबाइल फोन पर एक साथ 500 कैमरों तक की लाइव फुटेज देखने की सुविधा भी उपलब्ध कराई जानी है।
रिपोर्ट में निगरानी व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। आईएफएफ का कहना है कि टेंडर दस्तावेजों में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि चेहरे की पहचान के लिए किन लोगों का डेटा इस्तेमाल होगा, पहचान के नतीजों की सटीकता कैसे तय की जाएगी और गलत पहचान होने पर संबंधित व्यक्ति को शिकायत करने का क्या अधिकार होगा। इसके अलावा, चेहरों से जुड़े डिजिटल रिकॉर्ड, वाहनों की नंबर प्लेट और अन्य जानकारी को कितने समय तक सुरक्षित रखा जाएगा, इस बारे में भी स्पष्ट नियम नहीं दिए गए हैं।
आईएफएफ ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों की चेहरे की पहचान करने वाली तकनीक से निगरानी किए जाने का मुद्दा भी उठाया है। रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली पुलिस ने जुलाई 2026 में जंतर-मंतर पर मौजूद लोगों के चेहरों की पहचान के आधार पर 2,873 संभावित मिलान मिलने की बात कही थी। संगठन ने इन नतीजों की विश्वसनीयता और कानूनी वैधता पर सवाल उठाए हैं। प्रदर्शनकारियों की निगरानी और चेहरे की पहचान करने वाली तकनीक के इस्तेमाल से जुड़े व्यापक कानूनी सवालों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट की ओर से न्यायमूर्ति आर. सुभाष रेड्डी की अध्यक्षता में एक समिति भी गठित की गई है।
रिपोर्ट में टेंडर प्रक्रिया में तकनीकी और प्रशासनिक खामियों का भी दावा किया गया है। आईएफएफ के अनुसार, कुछ तकनीकी दस्तावेज दूसरे जिले के पुराने टेंडर से लिए गए प्रतीत होते हैं, कैमरों की संख्या से संबंधित विवरणों में विसंगतियां हैं और कुछ स्थानों के निर्देशांक भी गलत हैं। संगठन ने टेंडर में कुल 28 खामियां मिलने का दावा किया है।
आईएफएफ ने बताया कि वह सूचना के अधिकार के तहत आवेदन दाखिल कर कैमरों की खरीद की स्थिति, टेंडर के मूल्यांकन, चेहरे की पहचान के लिए इस्तेमाल होने वाले सॉफ्टवेयर और डेटाबेस तथा रिकॉर्ड सुरक्षित रखने की अवधि से संबंधित जानकारी मांगेगा। संगठन ने यह भी सवाल उठाया है कि सार्वजनिक स्थानों पर इस तरह की निगरानी व्यवस्था का इस्तेमाल किस कानूनी आधार पर किया जाएगा। इस पूरे मामले ने निजता के अधिकार, सरकारी निगरानी और शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन की स्वतंत्रता को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

