कर्नाटक: कर्नाटक हाईकोर्ट ने बाबरी मस्जिद मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ पोस्टर लगाने के आरोप में 13 लोगों के विरुद्ध दर्ज राजद्रोह के मामले को रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि न्याय से वंचित किए जाने की बात कहकर फैसले के प्रति असहमति जताना संविधान के तहत संरक्षित है। केवल किसी फैसले से असंतोष व्यक्त करना अपने आप में अपराध नहीं है।
मकतूब मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस एचपी संदेश ने 15 अक्टूबर को अपने आदेश में कहा कि मंगलुरु में लगाए गए पोस्टरों के जरिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के प्रति असहमति व्यक्त की गई थी। अदालत के अनुसार, पोस्टरों में न्याय से वंचित किए जाने की बात कहकर न्याय की मांग की गई थी। यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संविधान के अनुच्छेद 19 तथा 21 के दायरे में आता है।
मामला वर्ष 2019 का है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा बाबरी मस्जिद जमीन विवाद पर फैसला सुनाए जाने के बाद मंगलुरु दक्षिण पुलिस ने 16 नवंबर 2019 को स्वतः संज्ञान लेते हुए मामला दर्ज किया था। पुलिस का आरोप था कि पोस्टरों में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को न्याय से वंचित करने वाला बताया गया था। इस मामले में मोहम्मद हनीफ और अन्य लोगों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 153ए और 295ए के तहत कार्रवाई की गई थी। अभियोजन पक्ष का दावा था कि पोस्टरों से सामाजिक सद्भाव बिगड़ सकता है।
आरोपियों की ओर से पेश अधिवक्ता इस्माइल मुनीब मुस्बा ने अदालत में दलील दी कि संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है और पोस्टरों पर लिखे नारे राजद्रोह की श्रेणी में नहीं आते। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के 2024 के जावेद अहमद हाजम बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले का भी हवाला दिया। वकील ने कहा कि लोकतंत्र में सरकार या फैसलों के खिलाफ कानून के दायरे में असहमति जताना नागरिकों का अधिकार है।
हाईकोर्ट ने कहा कि पोस्टरों में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ आवाज उठाई गई थी और इस्तेमाल किए गए शब्दों में न्याय से वंचित किए जाने की बात कही गई थी। अदालत के मुताबिक, केवल कुछ लोगों में नफरत या दुर्भावना पैदा होने की आशंका के आधार पर भारतीय दंड संहिता की धारा 153ए के तहत अपराध नहीं माना जा सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि संबंधित धाराओं के तहत अपराध साबित करने के लिए आवश्यक कानूनी तत्वों का मौजूद होना जरूरी है।
गौरतलब है कि नवंबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने बाबरी मस्जिद की पूरी विवादित जमीन राम मंदिर निर्माण के लिए गठित किए जाने वाले ट्रस्ट को सौंपने का सर्वसम्मत फैसला सुनाया था। बाबरी मस्जिद को 6 दिसंबर 1992 को ध्वस्त कर दिया गया था। कर्नाटक हाईकोर्ट के इस आदेश में असहमति व्यक्त करने और उसे आपराधिक कृत्य मानने के बीच कानूनी अंतर पर जोर दिया गया है।

