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अडानी के खिलाफ ट्वीट करना पत्रकार रवि नायर को पड़ा महंगा, कोर्ट ने सुनाई 1 साल की सजा, पत्रकार संगठनों ने की कड़ी निंदा

अदानी एंटरप्राइजेज द्वारा दायर आपराधिक मानहानि मामले में खोजी पत्रकार रवि नायर को एक साल की सजा सुनाए जाने पर कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (CPJ) सहित कई पत्रकार संगठनों ने कड़ी निंदा की है। इन संगठनों ने इसे भारत में प्रेस स्वतंत्रता पर गंभीर हमला बताया है।

CPJ के एशिया प्रोग्राम कोऑर्डिनेटर कुनाल मजूमदार ने कहा, “पत्रकार रवि नायर को आपराधिक मानहानि के तहत दोषी ठहराया जाना प्रेस की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए एक खतरनाक मिसाल है।

ऐसे कानून, जिनमें मानहानि के लिए जेल की सजा का प्रावधान है, जनहित पत्रकारिता को दबाते हैं और ताकतवर लोगों की जांच-पड़ताल को हतोत्साहित करते हैं।”

10 फरवरी को गुजरात की एक मजिस्ट्रेट अदालत ने रवि नायर को दोषी ठहराते हुए एक साल की जेल और 5,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। यह मामला अक्टूबर 2020 से जुलाई 2021 के बीच X (पूर्व ट्विटर) पर की गई पोस्ट और ऑस्ट्रेलिया स्थित खोजी वेबसाइट Adani Watch पर प्रकाशित लेखों से जुड़ा है।
फैसले के तुरंत बाद रवि नायर ने X पर “हम देखेंगे” लिखा — जो तानाशाही के खिलाफ लिखी गई फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की प्रसिद्ध क्रांतिकारी नज़्म का संदर्भ है। नायर के पास फैसले को चुनौती देने के लिए 30 दिन का समय है।

दिल्ली यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (DUJ) ने एक बार फिर मानहानि को अपराध की श्रेणी से हटाने की मांग दोहराई। यूनियन ने कहा कि नायर को आईपीसी की धारा 499 (1860) जैसे औपनिवेशिक कानून के तहत सजा दी गई है।

यह मामला अरबपति गौतम अदानी के नेतृत्व वाले अदानी समूह की प्रमुख कंपनी अदानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड द्वारा दायर किया गया था। अदालत ने नायर की टिप्पणियों और प्रकाशनों को कंपनी की छवि को नुकसान पहुंचाने वाला बताया।

CPJ ने कहा कि रवि नायर लंबे समय से अदानी समूह पर टिप्पणी करते रहे हैं, जो वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों को लेकर जांच के दायरे में रहा है — हालांकि समूह ने इन आरोपों से इनकार किया है। नायर की कई पोस्ट टाइम्स ऑफ इंडिया और ब्लूमबर्ग जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों की रिपोर्ट्स पर आधारित थीं।

रवि नायर की सजा ऐसे समय में आई है, जब अदानी समूह द्वारा पत्रकारों और मीडिया संस्थानों के खिलाफ बार-बार दीवानी और आपराधिक मुकदमे दायर किए जाने को लेकर चिंता बढ़ रही है। सितंबर में नायर समेत 10 पत्रकारों को अदानी समूह से जुड़ी कथित मानहानिकारक सामग्री प्रकाशित करने से रोक दिया गया था।

वरिष्ठ पत्रकार जॉन दयाल ने मकतूब से बातचीत में कहा कि यह फैसला असहमति की आवाज़ों को दबाने की व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा है। उन्होंने कहा, “आज की न्यायिक व्यवस्था में पत्रकारों, लेखकों और कार्यकर्ताओं को लाइन से हटने पर इस तरह की सज़ा दी जा रही है।”

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