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पश्चिम बंगाल: मवेशी तस्करी के संदेह में गिरफ्तार मुस्लिम व्यक्ति की पुलिस हिरासत में मौत, निष्पक्ष जांच की मांग

कोलकाता: पश्चिम बंगाल के कूच बिहार जिले में मवेशी तस्करी के संदेह में गिरफ्तार 42 वर्षीय नूर हुसैन शेख की पुलिस हिरासत में मौत हो गई। घटना के बाद परिजनों और स्थानीय लोगों ने विरोध प्रदर्शन करते हुए मामले की निष्पक्ष जांच और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।

पुलिस के अनुसार, भारत-बांग्लादेश सीमा पर बाढ़ और नदियों में जलस्तर बढ़ने के कारण मवेशी तस्करी की आशंका के बीच सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) और पश्चिम बंगाल पुलिस ने मंगलवार को कलजानी नदी के किनारे संयुक्त अभियान चलाया। इस दौरान नूर हुसैन शेख को गिरफ्तार किया गया और आठ मवेशी जब्त किए गए। पुलिस का आरोप है कि इन मवेशियों को अंतरराष्ट्रीय सीमा पार ले जाने की कोशिश की जा रही थी।

कूच बिहार के पुलिस अधीक्षक जसप्रीत सिंह ने बताया कि बुधवार सुबह नूर हुसैन पुलिस लॉकअप में बेहोश मिले। उन्हें तुरंत तुफानगंज उपमंडल अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। पुलिस ने अप्राकृतिक मृत्यु का मामला दर्ज कर मजिस्ट्रेट की निगरानी में जांच शुरू कर दी है। प्रारंभिक जानकारी में डॉक्टरों ने बताया कि मृतक को पहले से उच्च रक्तचाप की समस्या थी और उनकी मौत स्ट्रोक से हुई हो सकती है। हालांकि, अंतिम कारण पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही स्पष्ट होगा।

दूसरी ओर, मृतक के परिवार ने पुलिस के दावों को खारिज करते हुए कहा कि नूर हुसैन का मवेशी तस्करी से कोई संबंध नहीं था। उनके भाई नूर मोहम्मद मियां का आरोप है कि हिरासत में लेने के बाद उनकी तबीयत बिगड़ गई थी, लेकिन पुलिस ने समय पर इलाज नहीं कराया। परिवार ने आरोप लगाया कि पुलिस और बीएसएफ की हिरासत में हुई यातना तथा लापरवाही के कारण उनकी मौत हुई।

घटना के बाद परिजनों और स्थानीय लोगों ने बालाभूत क्षेत्र में प्रदर्शन किया और निष्पक्ष जांच की मांग की। इस बीच मानवाधिकार संगठन एपीडीआर (एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स) ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति पर अपराध का आरोप भी हो, तब भी उसे कानून के तहत निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार है। संगठन का कहना है कि पुलिस हिरासत में किसी व्यक्ति की मौत गंभीर चिंता का विषय है और इसकी जवाबदेही तय की जानी चाहिए।

एपीडीआर के केंद्रीय सचिवालय के सदस्य राहुल चक्रवर्ती ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने और सजा देने का अधिकार केवल अदालत को है, पुलिस को नहीं। उन्होंने मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।

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