सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिल्ली दंगों से जुड़े मामले में गुलफिशा फ़ातिमा, मीरान हैदर, शिफ़ा-उर-रहमान, मोहम्मद सलीम ख़ान और शादाब अहमद को ज़मानत दिए जाने के फैसले का छात्र संगठन AISA ने स्वागत किया गया है।
हालांकि, इसी आदेश में उमर ख़ालिद और शरजील इमाम को ज़मानत न दिए जाने को न्याय की गंभीर विडंबना भी बताया जा रहा है।
संगठन का कहना है कि उमर ख़ालिद और शरजील इमाम की ज़मानत याचिकाओं पर लंबे समय तक सुनवाई में देरी के बाद भी उन्हें राहत नहीं मिलना उनके संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन है।
सुप्रीम कोर्ट ने ज़मानत से इनकार करते हुए कहा कि दोनों के ख़िलाफ़ प्रथम दृष्टया मामला बनता है और कथित रूप से उनकी भूमिका “केंद्रीय और निर्णायक” रही है, जिसमें योजना, mobilization और रणनीतिक दिशा तय करने में उनकी संलिप्तता बताई गई है।
आरोप है कि अदालत द्वारा इस तरह के तर्कों के आधार पर ज़मानत से इनकार करना चयनात्मक क़ैद (सेलेक्टिव इनकार्सरेशन) को बढ़ावा देता है। यह भी कहा गया है कि मुक़दमे में हो रही देरी और बार-बार ज़मानत की मांग के बावजूद दोनों को “केंद्रीय भूमिका” बताकर बदनाम किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि उमर ख़ालिद और शरजील इमाम संरक्षित गवाहों की जिरह के बाद या एक वर्ष के भीतर दोबारा ज़मानत के लिए आवेदन कर सकते हैं, जिसे आलोचकों ने बेहद अन्यायपूर्ण शर्त बताया है।
AISA ने संगठनों और समर्थकों ने राजनीतिक बंदियों की रिहाई के लिए सामूहिक संघर्ष की अपील करते हुए उमर ख़ालिद और शरजील इमाम को तत्काल ज़मानत दिए जाने की मांग की है।

