Madhya Pradesh High Court में धार स्थित भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर को लेकर चल रहे विवाद में मुस्लिम पक्ष ने महत्वपूर्ण दलील पेश की है। अदालत को बताया गया कि मस्जिद के निर्माण के लिए किसी मंदिर को तोड़े जाने का कोई ठोस ऐतिहासिक प्रमाण मौजूद नहीं है।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और आलोक अवस्थी की खंडपीठ कर रही है। Maulana Kamaluddin Welfare Society की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता Salman Khurshid ने तर्क दिया कि मंदिर विध्वंस के दावे तथ्यों और साक्ष्यों से समर्थित नहीं हैं।
उन्होंने कहा कि “किसी विशेष काल में मंदिर गिराकर उसी स्थान पर मस्जिद बनाने का कोई प्रमाण नहीं है।”
धार का यह परिसर लंबे समय से विवाद का केंद्र रहा है। हिंदू पक्ष इसे राजा भोज द्वारा निर्मित सरस्वती मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमल मौला मस्जिद बताता है, जिसका संबंध सूफी संत कमालुद्दीन चिश्ती से जोड़ा जाता है।
खुर्शीद ने अदालत में कहा कि मस्जिद का निर्माण तत्कालीन शासनकाल में हुआ था और इसे किसी जबरन विध्वंस से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।
सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष ने हिंदू याचिकाकर्ताओं के ऐतिहासिक दावों की प्रामाणिकता पर भी सवाल उठाए। एक कथित पत्र का हवाला देते हुए कहा गया कि ब्रिटिश संग्रहालय में रखी जिस मूर्ति को सरस्वती बताया जाता है, वह वास्तव में जैन देवी अंबिका की है।
उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि सभी ऐतिहासिक दस्तावेजों और सामग्रियों की कानूनी मानकों के अनुसार गहन जांच की जाए।
दलीलों के दौरान Supreme Court of India के अयोध्या फैसले का भी हवाला दिया गया। कहा गया कि ऐसे विवादों का समाधान ठोस साक्ष्यों और दीवानी कानून के सिद्धांतों के आधार पर होना चाहिए, न कि केवल ऐतिहासिक कथाओं के आधार पर।
अदालत में बहस का यह चरण पूरा हो चुका है और अब अगली सुनवाई निर्धारित तिथि पर जारी रहेगी। अदालत इस मामले से जुड़ी कई याचिकाओं और एक रिट अपील पर विचार कर रही है।
यह मामला देश में धार्मिक स्थलों के स्वामित्व और इतिहास से जुड़े विवादों पर एक बार फिर बहस को तेज कर रहा है।

