कर्नाटक में मुस्लिम संगठनों के एक बड़े सम्मेलन में कांग्रेस सरकार पर “सॉफ्ट हिंदुत्व” अपनाने और मुस्लिम समुदाय से किए गए कई वादे पूरे नहीं करने के आरोप लगाए गए। बेंगलुरु के टाउन हॉल में आयोजित इस सम्मेलन में आरक्षण, वक्फ संपत्तियों की सुरक्षा, हिजाब विवाद, नफरत फैलाने वाले भाषण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया गया।
सम्मेलन का आयोजन कर्नाटक फेडरेशन ऑफ मुस्लिम ऑर्गनाइजेशंस की ओर से किया गया था। कार्यक्रम का नारा था — “कांग्रेस सरकार ने क्या वादा किया था? क्या किया? और आगे क्या होगा?” इस दौरान सरकार के कामकाज पर आधारित 100 पन्नों की एक रिपोर्ट भी जारी की गई।
रिपोर्ट में कहा गया कि 2023 के विधानसभा चुनाव में मुस्लिम समुदाय के समर्थन के बाद शिक्षा और कल्याण के क्षेत्र में कुछ सुधार जरूर हुए, लेकिन आरक्षण, धार्मिक स्वतंत्रता, सम्मान, रोजगार और राजनीतिक हिस्सेदारी जैसे अहम मुद्दे अब भी अधूरे हैं।
संगठनों ने मांग करते हुए कहा कि मुस्लिमों के लिए पहले से लागू 4 प्रतिशत आरक्षण को दोबारा बहाल किया जाए, जिसे 2023 में भाजपा सरकार ने खत्म कर दिया था। साथ ही हिजाब प्रतिबंध से जुड़े आदेश को औपचारिक रूप से वापस लेने और वक्फ संपत्तियों की सुरक्षा के लिए सख्त कदम उठाने की मांग भी की गई।
रिपोर्ट में आरोप लगाया गया कि राज्य में आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों की रैलियां और जुलूस बिना रोक-टोक जारी हैं, जबकि सेक्युलर संगठनों और छात्र समूहों को प्रदर्शन और सभाओं की अनुमति लेने में मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। इससे प्रशासन पर पक्षपात के आरोप लगे हैं।
मुस्लिम संगठनों ने यह भी कहा कि राज्य में हेट स्पीच, फेक न्यूज, मॉब लिंचिंग, मॉरल पुलिसिंग और आर्थिक बहिष्कार जैसी घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं, लेकिन सरकार की कार्रवाई केवल एफआईआर दर्ज करने तक सीमित दिखाई देती है।
हिजाब विवाद को लेकर रिपोर्ट में कहा गया कि यह मुस्लिम छात्राओं के लिए “भेदभाव का सबसे बड़ा प्रतीक” बन गया है। हालांकि मुख्यमंत्री Siddaramaiah ने दिसंबर 2023 में प्रतिबंध हटाने की घोषणा की थी, लेकिन लंबे समय तक औपचारिक आदेश जारी नहीं होने से छात्राओं में असमंजस बना रहा। रिपोर्ट में दावा किया गया कि हिजाब विवाद के कारण बड़ी संख्या में मुस्लिम छात्राओं की पढ़ाई प्रभावित हुई।
इसके अलावा संगठनों ने गोहत्या कानून को वापस लेने, एंटी-कन्वर्जन कानून को खत्म करने और अल्पसंख्यक कल्याण के लिए 10 हजार करोड़ रुपये का विशेष बजट देने की मांग भी रखी।
सम्मेलन के संयोजक तनवीर अहमद ने कहा कि सिर्फ मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के साथ तस्वीरें खिंचवाने से समस्याओं का समाधान नहीं होगा, बल्कि सरकार को समुदाय के साथ गंभीर संवाद करना होगा।
आयोजकों के मुताबिक राज्यभर के 48 संगठनों के प्रतिनिधियों ने सम्मेलन में हिस्सा लिया और शिक्षा, आरक्षण, वक्फ प्रशासन तथा मुस्लिम समुदाय से जुड़े मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की गई।

