उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले के श्रीदत्तगंज ब्लॉक के गुमडी ग्राम पंचायत स्थित चाहतवा गांव में एक दलित हिंदू परिवार पिछले 35 वर्षों से मुहर्रम के अवसर पर ताजिया रखने की परंपरा निभा रहा है। यह परंपरा अब गांव में हिंदू-मुस्लिम एकता और गंगा-जमुनी तहज़ीब की मिसाल बन चुकी है।
यह परंपरा तीन पीढ़ियों से चली आ रही है। इसकी शुरुआत परिवार के बुजुर्ग आशाराम ने की थी, जिसे बाद में उनके पुत्र शिव प्रसाद ने आगे बढ़ाया और अब उनके पोते कमल कनोजिया इस परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं।
हर वर्ष मुहर्रम के दौरान परिवार श्रद्धा के साथ ताजिया तैयार कर उसे स्थापित करता है। इस अवसर पर आसपास के गांवों से भी बड़ी संख्या में लोग ताजिया देखने पहुंचते हैं।
कमल कनोजिया के अनुसार, इस परंपरा की शुरुआत परिवार की एक मन्नत पूरी होने के बाद हुई थी। उन्होंने बताया कि उनके पूर्वजों का विश्वास था कि मन्नत पूरी होने पर ताजिया रखना चाहिए। तभी से यह परंपरा लगातार चली आ रही है।
आशाराम का कहना है कि परिवार का विश्वास है कि ताजिया रखने से ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है, कठिनाइयां दूर होती हैं और घर में शांति व समृद्धि बनी रहती है। वहीं शिव प्रसाद ने बताया कि इस परंपरा के बाद खेती, व्यापार और परिवार की खुशहाली में भी सकारात्मक बदलाव आया है।
ग्रामीणों का कहना है कि यह परंपरा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि गांव में हिंदू-मुस्लिम भाईचारे का प्रतीक भी है। मुहर्रम के दौरान दोनों समुदाय एक-दूसरे के धार्मिक आयोजनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं, जिससे गांव की गंगा-जमुनी संस्कृति और सामाजिक सौहार्द मजबूत होता है।
स्थानीय लोगों के अनुसार, चाहतवा गांव की यह परंपरा इस बात का उदाहरण है कि आपसी सम्मान, साझा संस्कृति और सद्भाव से समाज में एकता और शांति को मजबूत किया जा सकता है।

