जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision-SIR) को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि यह केवल मतदाता सूची के संशोधन का मामला नहीं रह गया है, बल्कि नागरिकों के संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़ा गंभीर विषय बनता जा रहा है।
मौलाना मदनी ने कहा कि यदि नागरिकों को बार-बार अपनी नागरिकता और मतदान के अधिकार को साबित करने के लिए मजबूर किया जाता है, तो यह केवल मतदान का नहीं बल्कि संविधान, लोकतंत्र और नागरिक स्वतंत्रताओं का भी प्रश्न है।
उनके अनुसार, पहले भी मतदाता सूची का पुनरीक्षण होता रहा है, लेकिन मौजूदा SIR की प्रकृति, प्रक्रिया और संभावित प्रभाव पहले से अलग दिखाई देते हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि लाखों लोगों को सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने, विभिन्न दस्तावेज़ जुटाने और मानसिक तनाव झेलने के बावजूद यह भरोसा नहीं है कि उनका नाम मतदाता सूची में बना रहेगा। उनका कहना था कि यदि मतदान का संवैधानिक अधिकार सरकारी विवेक पर निर्भर हो जाए, तो यह भारतीय लोकतंत्र के लिए चिंताजनक स्थिति होगी।
मौलाना मदनी ने कहा कि जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने शुरुआत से ही आशंका जताई थी कि मौजूदा SIR प्रक्रिया कहीं राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) का नया रूप न बन जाए।
उन्होंने कहा कि विभिन्न राज्यों से सामने आ रही रिपोर्टें इन आशंकाओं को और मजबूत कर रही हैं। उनके अनुसार, चुनाव आयोग का संवैधानिक दायित्व स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराना है, नागरिकता तय करना नहीं।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि SIR की आड़ में वास्तविक नागरिकों को मताधिकार से वंचित करने की कोशिश की जा रही है और कई राज्यों में मुसलमानों को असमान रूप से निशाना बनाए जाने की शिकायतें सामने आ रही हैं। पश्चिम बंगाल का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि लाखों मतदाताओं को “संदिग्ध” बताना लोकतंत्र पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
मौलाना मदनी ने नागरिकों, विशेषकर मुसलमानों, से अपील की कि वे सभी आवश्यक दस्तावेज़ पहले से तैयार रखें और किसी भी फॉर्म को जल्दबाज़ी या लापरवाही में न भरें, क्योंकि छोटी तकनीकी गलती भी आगे चलकर कानूनी परेशानी का कारण बन सकती है।
उन्होंने भरोसा दिलाया कि जमीयत उलेमा-ए-हिंद अपने स्वयंसेवकों, वकीलों और कानूनी विशेषज्ञों के माध्यम से देशभर में दस्तावेज़ सत्यापन, कानूनी सलाह और सहायता उपलब्ध कराता रहेगा ताकि कोई भी नागरिक तकनीकी कारणों से अपने संवैधानिक अधिकारों से वंचित न हो।
मौलाना मदनी ने कहा कि यदि SIR के नाम पर किसी भी नागरिक के मतदान या अन्य संवैधानिक अधिकारों को प्रभावित करने का प्रयास किया गया, तो जमीयत उलेमा-ए-हिंद कानूनी, संवैधानिक और लोकतांत्रिक स्तर पर उसका विरोध करेगी।
उन्होंने विपक्षी दलों द्वारा इस मामले को सर्वोच्च न्यायालय में ले जाने के फैसले का भी स्वागत किया और उम्मीद जताई कि न्यायालय संविधान की सर्वोच्चता तथा नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करेगा।

