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महाराष्ट्र: धर्मांतरण विरोधी कानून से पहले ‘चर्च’ ने शुरू कराया स्वैच्छिक प्रार्थना घोषणापत्र

महाराष्ट्र में नए धर्मांतरण विरोधी कानून के लागू होने से पहले मुंबई महानगर क्षेत्र के कई चर्चों ने अपने श्रद्धालुओं से स्वैच्छिक प्रार्थना घोषणापत्र पर हस्ताक्षर करवाना शुरू कर दिया है। चर्चों का कहना है कि यह कदम प्रार्थना सभाओं में जबरन धर्मांतरण के आरोपों से बचने और श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए एहतियाती तौर पर उठाया गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक मुंबई, ठाणे, वसई-विरार, पालघर और मीरा-भायंदर क्षेत्र के कुछ चर्चों में श्रद्धालुओं के बीच ये फॉर्म बांटे जा रहे हैं। घोषणापत्र में श्रद्धालुओं से यह पुष्टि करने को कहा गया है कि वे बिना किसी दबाव, प्रलोभन, लालच या धमकी के अपनी इच्छा से प्रार्थना सभाओं में शामिल हो रहे हैं।

कुछ फॉर्म में श्रद्धालुओं से पैन या आधार नंबर, पासपोर्ट साइज फोटो और कुछ मामलों में गवाहों की जानकारी भी मांगी गई है। घोषणापत्र में यह भी कहा गया है कि चर्च जाना और धार्मिक सभाओं में हिस्सा लेना संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 के तहत प्राप्त धार्मिक स्वतंत्रता का हिस्सा है।

चर्च नेताओं के अनुसार, अप्रैल से जुलाई के बीच प्रार्थना सभाओं में व्यवधान को लेकर कई एफआईआर दर्ज होने के बाद इस तरह के दस्तावेज तैयार किए जा रहे हैं। विरार के एक चर्च के पादरी स्टीवन रोजारियो ने कहा कि अगर भविष्य में चर्च या श्रद्धालुओं पर जबरन धर्मांतरण का आरोप लगाया जाता है तो ये घोषणापत्र इस बात के सबूत के तौर पर पेश किए जा सकते हैं कि लोग अपनी इच्छा से प्रार्थना सभा में शामिल हुए थे।

वसई के पादरी सैम मथाई ने बताया कि कुछ चर्च पिछले दो-तीन महीनों से ऐसे घोषणापत्र जमा कर रहे हैं। वहीं, महाराष्ट्र क्रिश्चियन डेवलपमेंट एसोसिएशन के अध्यक्ष देवदान त्रिभुवन ने स्पष्ट किया कि ये कोई सरकारी दस्तावेज नहीं हैं, बल्कि चर्चों और श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए तैयार किए गए स्व-घोषणा पत्र हैं।

महाराष्ट्र का धर्म की स्वतंत्रता अधिनियम, 2026 जुलाई में अधिसूचित किया गया था और 28 अगस्त से लागू होना है। कानून में बल, धोखाधड़ी, दबाव, प्रलोभन, धमकी, अनुचित प्रभाव या विवाह के वादे के जरिए कथित धर्मांतरण के लिए सजा का प्रावधान है। इसके तहत धर्म परिवर्तन की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को जिला मजिस्ट्रेट को 60 दिन पहले सूचना देने की प्रक्रिया भी निर्धारित की गई है। कानून के लागू होने से पहले चर्चों द्वारा उठाए गए इस कदम ने धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा को लेकर बहस तेज कर दी है।

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