संयुक्त राष्ट्र समिति ने 19 साल बाद भारत पर जारी की रिपोर्ट, भेदभाव और घृणा अपराधों पर जताई चिंता
नई दिल्ली: नस्लीय भेदभाव के उन्मूलन पर संयुक्त राष्ट्र समिति (CERD) ने करीब 19 साल बाद भारत की स्थिति की समीक्षा के बाद अपनी निष्कर्ष टिप्पणियां जारी की हैं। समिति ने भारत में जातिगत भेदभाव, अल्पसंख्यकों के खिलाफ हमले, घृणा अपराध, नागरिक स्वतंत्रताओं में कमी, नस्लीय प्रोफाइलिंग और प्रवासियों के साथ व्यवहार समेत कई मुद्दों पर चिंता व्यक्त की है।
समिति ने कहा कि कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा जातीय और जातीय-धार्मिक समूहों, आदिवासी समुदायों, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति, विशेष रूप से दलितों तथा गैर-नागरिकों के खिलाफ कथित उल्लंघनों की रिपोर्टें गंभीर चिंता का विषय हैं। इनमें नस्लीय हिंसा, अत्यधिक बल प्रयोग, गैर-न्यायिक हत्याएं, मनमानी हिरासत, यातना, दुर्व्यवहार और यौन हिंसा जैसे आरोप शामिल हैं।
संयुक्त राष्ट्र समिति ने भारत सरकार से इन सभी आरोपों की त्वरित, गहन और निष्पक्ष जांच कराने तथा दोषियों को जवाबदेह ठहराने की अपील की है। समिति ने विशेष रूप से रोहिंग्या, बंगाली भाषी मुसलमानों, प्रवासियों और शरण चाहने वालों के खिलाफ भेदभाव, नफरत फैलाने वाले भाषण और घृणा अपराधों को तत्काल संबोधित करने की जरूरत बताई है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि संबंधित लोगों के अधिकारों की रक्षा की जानी चाहिए और सामूहिक निष्कासन से बचते हुए गैर-वापसी के सिद्धांत के अनुरूप अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा तक उनकी पहुंच सुनिश्चित की जानी चाहिए। समिति ने 11-12 अगस्त को भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के नेतृत्व में भारतीय प्रतिनिधिमंडल के साथ हुए संवाद का भी स्वागत किया।
सत्र के दौरान समिति की विशेषज्ञ और भारत की रिपोर्टर स्टैमाटिया स्टावरिनाकी ने कहा कि स्वतंत्र निगरानी में वर्ष 2025 में 1,300 से अधिक मुस्लिम विरोधी घृणास्पद भाषण की घटनाएं दर्ज की गईं। समिति ने यह भी कहा कि वरिष्ठ अधिकारियों से जुड़े बार-बार सामने आने वाले बयानों को लेकर चिंता बनी हुई है। इसके जवाब में भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि 2023 के कानून के तहत घृणास्पद भाषण और घृणा अपराध से जुड़े कृत्यों को अपराध घोषित किया गया है तथा धर्म की स्वतंत्रता भारत के संविधान द्वारा सुनिश्चित की गई है।
समिति ने राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) और बंगाली भाषी मुसलमानों के संबंध में भी चिंता जताई। उसके मुताबिक बंगाली भाषी मुसलमानों को “गैर-मूल निवासी” के रूप में वर्गीकृत किए जाने और NRC सत्यापन प्रक्रिया में उनके लिए कथित तौर पर अधिक कठोर मानक अपनाए जाने को लेकर सवाल हैं। समिति ने भारत में जातीय, आदिवासी, प्रवासी, शरणार्थी और अन्य गैर-नागरिक समूहों से संबंधित अलग-अलग और अद्यतन आंकड़ों की कमी पर भी चिंता जताई है।

