जम्मू-कश्मीर से लोकसभा सांसद आग़ा सैयद रुहुल्लाह मेहदी ने पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला को पत्र लिखकर उनके उस बयान पर सवाल उठाए हैं, जिसमें उन्होंने रुहुल्लाह मेहदी से इस्तीफा देने की मांग की थी। अपने पत्र में मेहदी ने कहा कि 25 अगस्त को फारूक अब्दुल्ला का यह बयान सुनकर उन्हें खुशी हुई कि “आप कब तक गुलाम रहेंगे? कभी-कभी अपने पैरों पर खड़ा होना होगा। आप कब खड़े होंगे?”
उन्होंने कहा कि ये शब्द जम्मू-कश्मीर के लोगों की उस निराशा को सामने रखते हैं, जिसमें अपने जायज़ अधिकारों के लिए भी उनसे BJP के सामने याचना करने जैसी स्थिति की उम्मीद की जाती है।
मेहदी ने फारूक अब्दुल्ला के उस बयान पर भी सवाल उठाया, जिसमें उन्होंने कहा था कि “आप 370 चाहते हैं, लेकिन दिल्ली के सामने भीख मांगते हैं।” सांसद ने कहा कि जम्मू-कश्मीर के लोग इस समय अनुच्छेद 370 की मांग के लिए नहीं, बल्कि राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग को सुप्रीम कोर्ट भी मान्यता दे चुका है और BJP ने 2024 के विधानसभा चुनाव के अपने घोषणापत्र में भी इसका वादा किया था।
पत्र में मेहदी ने अनुच्छेद 370 और 35A की बहाली के मुद्दे पर JKNC की स्थिति को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि राज्य के दर्जे को ही राजनीतिक मांगों की अंतिम सीमा मान लेना अगस्त 2019 की घटनाओं को सामान्य बनाने जैसा है। उनके मुताबिक, जम्मू-कश्मीर की विशेष भौगोलिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय परिस्थितियों को देखते हुए लोगों के संवैधानिक अधिकारों और सुरक्षा की गारंटी बेहद जरूरी है।
मेहदी ने 2024 के घोषणापत्र में अनुच्छेद 370 की बहाली का वादा शामिल किए जाने पर भी सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि जब BJP उस समय सत्ता में थी, तब घोषणापत्र में 370 की बहाली का वादा क्यों किया गया? क्या ऐसे वादे किए गए जिन्हें पूरा करने का इरादा नहीं था? उन्होंने कहा कि यदि ऐसा था तो यह सिर्फ राजनीतिक भूल नहीं, बल्कि दशकों से पीड़ित जम्मू-कश्मीर की जनता को गुमराह करने की गंभीर नैतिक विफलता होगी।
सांसद ने कहा कि उन्हें अपनी राजनीतिक स्थिति को लेकर बार-बार यह बताया जाता है कि उनकी मांगें व्यावहारिक नहीं हैं, लेकिन उनके लिए अनुच्छेद 370 केवल एक राजनीतिक मुद्दा नहीं बल्कि जम्मू-कश्मीर के लोगों की गरिमा, सम्मान, संवैधानिक अधिकारों और स्वतंत्रता की लड़ाई का प्रतीक है। उन्होंने बेरोजगारी, युवाओं के भविष्य, जमीन और संसाधनों पर बढ़ते दबाव, धार्मिक अधिकारों, परंपराओं और भाषा के सामने मौजूद चुनौतियों का भी जिक्र किया। साथ ही अवैध वनों की कटाई, खनन और संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण को लेकर चिंता जताई।
मेहदी ने उमर अब्दुल्ला से पूछा कि जब वह उस विधानसभा के मुख्यमंत्री रहे हैं जिसने ऑटोनॉमी रिजॉल्यूशन पारित किया था, तो आज जम्मू-कश्मीर के संवैधानिक अधिकारों की बात करना उन्हें आपत्तिजनक क्यों लग रहा है। उन्होंने कहा कि वह ये सवाल किसी अनादर के कारण नहीं, बल्कि यह जानने के लिए पूछ रहे हैं कि जम्मू-कश्मीर की जनता की आकांक्षाएं बदली हैं या JKNC की उनके लिए खड़े होने की इच्छा।
पत्र के अंत में आग़ा सैयद रुहुल्लाह मेहदी ने कहा कि अभी उनके पास कई और सवाल हैं और वह उमर अब्दुल्ला के जवाब का इंतजार करेंगे। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर की जनता को यह जानने का अधिकार है कि JKNC वास्तव में किन मुद्दों के साथ खड़ी है। इस्तीफे की मांग पर उन्होंने कहा, “रेजिग्नेशन आएगा। आपके मांगने के बिना भी आ जाता, लेकिन उससे पहले जवाबदेही जरूरी है।” उन्होंने उमर अब्दुल्ला द्वारा इस्तीफे की मांग करते समय किए गए कथित “अपमानजनक हमले” का भी जवाब देने की बात कही है।

