Journo Mirror
India

UN की नस्लभेद समिति की भारत पर रिपोर्ट: मुस्लिमों, दलितों और आदिवासियों के खिलाफ भेदभाव पर जताई गंभीर चिंता

नई दिल्ली: संयुक्त राष्ट्र की नस्लीय भेदभाव उन्मूलन समिति (CERD) ने भारत की मानवाधिकार स्थिति को लेकर गंभीर चिंताएं जताई हैं। 25 अगस्त को जारी अपनी रिपोर्ट में समिति ने दलितों, आदिवासियों और मुस्लिमों के खिलाफ कथित भेदभाव, हिरासत, अत्याचार, नफरती भाषण और हिंसा की रिपोर्टों पर चिंता व्यक्त की। यह 19 साल बाद भारत की समिति के सामने पहली समीक्षा थी।

समिति ने खास तौर पर असम में बंगाली भाषी मुसलमानों के साथ कथित व्यवहार को लेकर कहा कि उन्हें NRC की तैयारी और अपडेट की प्रक्रिया में “व्यवस्थित और संरचनात्मक नस्लीय भेदभाव” का सामना करना पड़ रहा है। समिति ने भारत से NRC को निलंबित करने, नागरिकता संशोधन कानून की समीक्षा करने और नागरिकता-विहीनता से जुड़े दो अंतरराष्ट्रीय समझौतों में शामिल होने की सिफारिश की।

CERD ने पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के Special Intensive Revision (SIR) के दौरान बंगाली भाषी मुस्लिम मतदाताओं के कथित रूप से अनुपातहीन रूप से प्रभावित होने की रिपोर्ट पर भी चिंता जताई। समिति ने कहा कि असम और पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ अधिकारियों की ओर से भारतीय मुस्लिम नागरिकों को विदेशियों के साथ जोड़कर देखे जाने वाली टिप्पणियां “जातीय-धार्मिक आधार पर भेदभावपूर्ण व्यवहार के आधिकारिक समर्थन” का संकेत दे सकती हैं।

संयुक्त राष्ट्र समिति ने भारत के उस रुख को खारिज किया कि जातिगत भेदभाव उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। CERD ने कहा कि जातिगत भेदभाव अंतरराष्ट्रीय नस्लीय भेदभाव उन्मूलन संधि के दायरे में पूरी तरह आता है। समिति ने उस 1950 के राष्ट्रपति आदेश की समीक्षा की भी मांग की, जिसके तहत धर्म परिवर्तन के बाद दलितों को मिलने वाले कुछ संवैधानिक संरक्षण प्रभावित होते हैं।

समिति ने मुस्लिम और ईसाई दलितों तथा आदिवासियों को निशाना बनाने वाले कथित संगठित समूहों के खिलाफ कार्रवाई करने और ऐसे समूहों को खत्म करने की भी सिफारिश की। आदिवासी समुदायों के अधिकारों को लेकर समिति ने ग्रेट निकोबार परियोजना और अंडमान से संबंधित परियोजनाओं को स्वतंत्र प्रभाव आकलन पूरा होने तक रोकने की मांग की।

CERD ने भारत में मुस्लिमों और अन्य समुदायों के खिलाफ हेट स्पीच और हेट क्राइम की रिपोर्टों पर भी गंभीर चिंता जताई। समिति ने भारत से नस्लीय नफरत फैलाने वाले भाषण और अपराधों को स्पष्ट रूप से अपराध की श्रेणी में शामिल करने तथा नस्लीय उद्देश्य को अपराध की गंभीरता बढ़ाने वाला कारक मानने को कहा।

समिति ने कानून लागू करने वाली एजेंसियों पर दलितों, आदिवासियों, मुस्लिमों और अन्य समुदायों के खिलाफ फर्जी मुठभेड़, मनमानी हिरासत, यातना और यौन हिंसा के आरोपों पर भी चिंता जताई। इसके अलावा मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और नागरिक समाज संगठनों पर लागू UAPA, PMLA, FCRA और AFSPA जैसे कानूनों की समीक्षा करने की सिफारिश की गई।

UN समिति की रिपोर्ट जारी होने के एक दिन बाद भारत के विदेश मंत्रालय ने इसके निष्कर्षों को खारिज कर दिया। मंत्रालय ने समिति की टिप्पणियों को “राजनीतिक रूप से प्रेरित” और “दुर्भावनापूर्ण” बताया और कहा कि भारत इन्हें पूरी तरह खारिज करता है।

भारत की ओर से समीक्षा के दौरान भी समिति के सामने रखी गई कई रिपोर्टों पर आपत्ति जताई गई थी। भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने कई आरोपों को गलत या “गलत नैरेटिव” बताया था। वहीं, समिति ने अपनी अंतिम टिप्पणियों में कई मामलों पर भारत के जवाब से अलग निष्कर्ष दर्ज किए।

CERD ने भारत की तीन सिफारिशों को प्राथमिकता वाले फॉलो-अप के लिए चुना है। इनमें कानून प्रवर्तन एजेंसियों के खिलाफ शिकायतों के लिए सुरक्षित माध्यम तैयार करना, ग्रेट निकोबार और अंडमान से जुड़ी परियोजनाओं को लेकर कार्रवाई और अनियमित प्रवेश को अपराध की श्रेणी से बाहर करना तथा इमिग्रेशन हिरासत को अंतिम उपाय के रूप में इस्तेमाल करना शामिल है।

समिति ने कहा कि भारत को इन प्राथमिक मुद्दों पर दो साल के भीतर रिपोर्ट देनी होगी। भारत की अगली पूर्ण रिपोर्ट 4 जनवरी 2030 तक समिति को सौंपे जाने की उम्मीद है।

हालांकि CERD की रिपोर्ट कोई अदालत का फैसला नहीं है और इसके साथ सीधे तौर पर कोई दंड नहीं जुड़ा है, लेकिन समिति ने कहा है कि उसके निष्कर्ष भारत में दलितों, आदिवासियों, मुस्लिमों और अन्य प्रभावित समुदायों से जुड़े मुद्दों की अंतरराष्ट्रीय निगरानी और भविष्य की समीक्षा का आधार बनेंगे।

Related posts

Leave a Comment