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महाराष्ट्र: धर्मांतरण विरोधी कानून को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती, धार्मिक स्वतंत्रता और निजता के अधिकार पर हमला बताया

मुंबई। महाराष्ट्र के नए धर्मांतरण विरोधी कानून की संवैधानिक वैधता को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। याचिका में महाराष्ट्र स्वतंत्रता धर्म अधिनियम, 2026 की कई धाराओं को संविधान में मिले धार्मिक स्वतंत्रता, निजता, गरिमा और व्यक्तिगत स्वायत्तता के अधिकारों का उल्लंघन करने वाला बताया गया है।

मौलाना हलीमुल्लाह फारूक अहमद खान की ओर से अधिवक्ता अब्दुल मतीन शेख के माध्यम से दाखिल याचिका में कानून की धारा 2(ए), 3, 6, 7 और 9 को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता का दावा है कि ये प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(ए), 19(1)(सी), 21, 25, 26 और 29 में दिए गए मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं।

याचिका में कहा गया है कि राज्य सरकार जबरदस्ती, धोखाधड़ी या दबाव के जरिए होने वाले धर्मांतरण को रोकने के लिए कानून बना सकती है, लेकिन मौजूदा कानून इस उद्देश्य से आगे बढ़कर लोगों की धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत पसंद पर व्यापक प्रतिबंध लगाता है। याचिकाकर्ता ने कानून के प्रावधानों को अस्पष्ट, अत्यधिक व्यापक और असंगत बताया है।

याचिका में विशेष रूप से धारा 2(ए) में ‘प्रलोभन’ की परिभाषा पर सवाल उठाया गया है। इसमें ‘बेहतर जीवनशैली’ और ‘दैवीय उपचार’ जैसे शब्दों को शामिल किया गया है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि इन शब्दों की व्यापक व्याख्या धार्मिक प्रचार, सामाजिक सेवा, शिक्षा और धार्मिक गतिविधियों को भी अपराध की श्रेणी में ला सकती है।

याचिका में कहा गया है कि कानून की ऐसी व्याख्या से उन लोगों के स्वैच्छिक धर्म परिवर्तन पर भी आपराधिक कार्रवाई का खतरा पैदा हो सकता है, जहां किसी तरह का बल, धोखाधड़ी या जबरदस्ती मौजूद नहीं है। याचिकाकर्ता के मुताबिक, किसी व्यक्ति को अपनी अंतरात्मा और विश्वास के आधार पर धर्म चुनने की स्वतंत्रता संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत प्राप्त है।

कानून की धारा 6 और 7 को भी चुनौती दी गई है। इन धाराओं के तहत प्रस्तावित धर्मांतरण की पूर्व सूचना देने और सरकारी अधिकारियों द्वारा इसकी जांच या पड़ताल की व्यवस्था है। याचिका में दावा किया गया है कि ऐसी व्यवस्था व्यक्ति की निजता, गरिमा, पहचान और व्यक्तिगत निर्णय लेने की स्वतंत्रता में अनावश्यक हस्तक्षेप करती है।

वहीं, धारा 9 के तहत आपराधिक सजा का प्रावधान भी याचिका में सवालों के घेरे में है। याचिकाकर्ता का कहना है कि जब कानून की मूल परिभाषाएं ही अस्पष्ट और व्यापक हैं, तो उनके आधार पर आपराधिक जिम्मेदारी तय करना मनमानी कार्रवाई का रास्ता खोल सकता है और लोगों को अपने मौलिक अधिकारों का इस्तेमाल करने से हतोत्साहित कर सकता है।

याचिकाकर्ता ने बॉम्बे हाईकोर्ट से मांग की है कि चुनौती दी गई धाराओं को असंवैधानिक घोषित कर रद्द किया जाए। वैकल्पिक रूप से अदालत से इन प्रावधानों की ऐसी व्याख्या करने की मांग की गई है, जिससे कानून केवल वास्तविक बल, धोखाधड़ी, जबरदस्ती या ऐसे अन्य तरीकों से होने वाले धर्मांतरण पर लागू हो, जो व्यक्ति की स्वतंत्र और सूचित सहमति को प्रभावित करते हों।

महाराष्ट्र सरकार ने नए कानून को 28 अगस्त से लागू किया है। कानून में कथित तौर पर बल, धोखाधड़ी, धमकी, गलत प्रस्तुतीकरण, प्रलोभन या अनुचित प्रभाव के जरिए धर्मांतरण को अपराध बनाया गया है। विवाह या विवाह के वादे से जुड़े कथित धर्मांतरण को भी कानून के दायरे में रखा गया है। कानून में नाबालिग, महिला, अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्य अथवा मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति से जुड़े मामलों में अधिक सख्त सजा का प्रावधान किया गया है।

महाराष्ट्र विधानसभा द्वारा पारित किए जाने के बाद इस कानून को राष्ट्रपति की मंजूरी मिली थी और राज्य सरकार ने 31 जुलाई को इसे अधिसूचित किया था। इससे पहले एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने प्रस्तावित कानून की आलोचना करते हुए इसे उत्तर प्रदेश समेत अन्य राज्यों में लागू धर्मांतरण विरोधी कानूनों से भी अधिक कठोर बताया था।

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