श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने कुपवाड़ा के शोधार्थी शफात मकबूल वानी की सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम (PSA) के तहत की गई निवारक हिरासत को रद्द करते हुए उनकी तत्काल रिहाई का आदेश दिया है। अदालत ने कहा कि किसी शोधार्थी के पास अलग-अलग तरह की किताबें होना अपने आप में उसे अपराधी नहीं बना देता। अदालत ने यह भी कहा कि केवल “निराशाजनक शीर्षक” वाली किताबों का कब्जे में होना निवारक हिरासत लागू करने का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता।
जस्टिस मोक्ष खजूरिया काज़मी ने 3 सितंबर को मामले की सुनवाई करते हुए अधिकारियों को वानी को तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया। वानी की हिरासत को उनके चाचा ने अदालत में चुनौती दी थी। वानी को पिछले साल PSA के तहत हिरासत में लिया गया था। हिरासत आदेश में उनके पिता के कथित पूर्व उग्रवादी संबंध, अंतरराष्ट्रीय अकादमिक सम्मेलनों में उनकी भागीदारी, उनके पास मिली कुछ किताबों और यूएपीए के एक मामले का हवाला दिया गया था, जिसमें उन्हें पहले ही जमानत मिल चुकी थी।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि अधिकारियों ने वानी के खिलाफ ऐसी कोई विध्वंसकारी गतिविधि नहीं दिखाई, जिसके आधार पर निवारक हिरासत की जरूरत साबित होती हो। अदालत ने यह भी माना कि हिरासत लेने वाले अधिकारी ने वानी के खिलाफ कथित प्रतिकूल गतिविधि को लेकर पर्याप्त संतुष्टि दर्ज करने की प्रक्रिया का पालन नहीं किया। अदालत ने कहा कि मामले में “नॉन-एप्लिकेशन ऑफ माइंड” यानी तथ्यों और परिस्थितियों पर उचित तरीके से विचार नहीं किए जाने की दलील में दम है।
पुलिस ने वानी के घर से Construction of an Islamic Order in Hindutva Reimagination और The Saffronisation of Occupied Kashmir: Demystifying Hindutva Settlers, Colonial Designers जैसी किताबें बरामद होने का दावा किया था। अधिकारियों ने इन किताबों को कथित तौर पर अलगाववादी विचारधारा को बढ़ावा देने वाला साहित्य बताया था। हालांकि, अदालत ने कहा कि एक अकादमिक शोधार्थी के पास विभिन्न प्रकार की साहित्यिक सामग्री होना स्वाभाविक है और केवल किताबों के शीर्षक या उनके कब्जे में होने के आधार पर किसी व्यक्ति को अपराधी नहीं माना जा सकता।
अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि कथित “राष्ट्र-विरोधी साहित्य” को वानी के खिलाफ इस्तेमाल किया गया, जबकि अधिकारियों ने उन किताबों के लेखकों और वानी के बीच अंतर पर भी पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। अदालत ने कहा कि किताबों के केवल कब्जे में होने से यह साबित नहीं होता कि संबंधित व्यक्ति ऐसी गतिविधि में शामिल है, जिसके आधार पर PSA जैसी कड़ी निवारक हिरासत लागू की जाए।
वानी के खिलाफ 2025 में दर्ज एक यूएपीए मामले का भी हिरासत आदेश में उल्लेख किया गया था। हालांकि, जांच एजेंसी की 155 दिनों से अधिक रिमांड बढ़ाने की मांग को विशेष न्यायाधीश, एनआईए कोर्ट, जम्मू ने स्वीकार नहीं किया था और इसके बाद वानी को जमानत मिल गई थी। अदालत ने इस तथ्य को भी अपने आदेश में ध्यान में रखा।
हिरासत आदेश में वानी के पारिवारिक पृष्ठभूमि का भी उल्लेख किया गया था। इसमें उनके पिता के कथित पूर्व उग्रवादी संबंधों और 1990 में उनके आत्मसमर्पण का जिक्र था। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय अकादमिक सम्मेलनों में वानी की भागीदारी को भी हिरासत के आधारों में शामिल किया गया था। अदालत ने इन परिस्थितियों के आधार पर भी यह सवाल उठाया कि आखिर वानी की ऐसी कौन-सी विशिष्ट गतिविधि थी, जो राज्य की सुरक्षा के लिए प्रतिकूल साबित हो रही थी।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के Ameena Begum बनाम State of Telangana मामले का भी हवाला दिया। अदालत ने कहा कि निवारक हिरासत के लिए हिरासत लेने वाले प्राधिकारी को संबंधित परिस्थितियों पर स्वतंत्र रूप से विचार करना और व्यक्ति के पिछले आचरण तथा हिरासत की वास्तविक जरूरत के बीच स्पष्ट और निकट संबंध स्थापित करना आवश्यक है।
यह फैसला ऐसे समय आया है जब जम्मू-कश्मीर प्रशासन की ओर से अगस्त 2025 में कश्मीर के इतिहास से संबंधित 25 किताबों के प्रकाशन और प्रसार पर प्रतिबंध लगाए जाने को लेकर भी सवाल उठे थे। प्रशासन ने इन पुस्तकों पर क्षेत्र में कथित “झूठी कहानी” और “अलगाववाद” को बढ़ावा देने का आरोप लगाया था। प्रतिबंध के बाद कश्मीर में अकादमिक और बौद्धिक स्वतंत्रता को लेकर चिंताएं भी सामने आई थीं।
शफात मकबूल वानी के मामले में हाईकोर्ट का फैसला निवारक हिरासत के इस्तेमाल और किताबों तथा अकादमिक गतिविधियों को सुरक्षा संबंधी आरोपों से जोड़ने के तरीके पर महत्वपूर्ण न्यायिक टिप्पणी के रूप में सामने आया है। अदालत के आदेश के बाद वानी की PSA हिरासत समाप्त हो गई है और उनकी तत्काल रिहाई का रास्ता साफ हो गया है।

