नई दिल्ली। नोएडा के श्रमिकों और कार्यकर्ताओं की रिहाई की मांग को लेकर अभियान चला रहे Campaign for the Release of Workers and Activists of Noida (CaRWAN) ने 10 सितंबर को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, नई दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इसका शीर्षक था, “A Concocted Story: NSA on Akriti quashed by Allahabad HC, CCTV catches UP Police planting evidence; The Irrepressible Truth behind Noida Workers’ Protest Case”। प्रेस कॉन्फ्रेंस में वक्ताओं ने नोएडा श्रमिक आंदोलन से जुड़े मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए और गिरफ्तार कार्यकर्ताओं व श्रमिकों की रिहाई की मांग की।
CaRWAN ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की ओर से छात्रा और थिएटर कलाकार अकृति चौधरी के खिलाफ लगाए गए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) की कार्रवाई को रद्द किए जाने का हवाला देते हुए कहा कि यह फैसला उन आरोपों की पुष्टि करता है, जिन्हें संगठन और अन्य नागरिक पिछले करीब पांच महीनों से उठाते रहे हैं। संगठन का आरोप है कि पुलिस ने श्रमिकों के बेहतर वेतन और काम की परिस्थितियों को लेकर हुए विरोध को आपराधिक साजिश के रूप में पेश किया और असहमति की आवाजों को दबाने की कोशिश की। संगठन के मुताबिक, हाईकोर्ट ने NSA की कार्रवाई को रद्द करते हुए राज्य की दलीलों को ‘मनगढ़ंत’ बताया और संबंधित अधिकारियों की कार्रवाई पर भी सवाल उठाए।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में CaRWAN से जुड़े कार्यकर्ता केशव ने कहा कि मामले की शुरुआत से ही पुलिस की कार्रवाई एक “मनगढ़ंत कहानी” तैयार करने जैसी रही है। उन्होंने कहा कि 11 अप्रैल से ही पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह ने कथित “मास्टरमाइंड” को पकड़ने के लिए मजबूत इलेक्ट्रॉनिक और वीडियो साक्ष्य होने का दावा किया था, लेकिन बाद में ऐसा कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया। इसके बजाय, उनके अनुसार, लगातार गिरफ्तारियां होती रहीं और आरोपियों के खिलाफ अलग-अलग एफआईआर दर्ज की गईं। केशव ने दावा किया कि जब गिरफ्तार लोगों को जमानत मिलने की संभावना दिखाई देने लगी तो अकृति चौधरी और वरिष्ठ पत्रकार एवं अनुवादक सत्याम वर्मा के खिलाफ NSA लगाया गया।
CaRWAN ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक सीसीटीवी फुटेज का भी हवाला दिया और पुलिस पर सबूत प्लांट करने का आरोप लगाया। संगठन के मुताबिक, पुलिस हिरासत के दौरान सृष्टि को उसके घर ले जाया गया था, जहां कथित तौर पर बरामदगी की कार्रवाई दिखाई जानी थी। संगठन का दावा है कि सीसीटीवी फुटेज में पुलिसकर्मी पहले से जब्त किए जा चुके फोन और एक किताब को घर में रखते हुए दिखाई देते हैं और सृष्टि को उन्हें उठाने के लिए कहते हैं। संगठन के अनुसार, कैमरों पर नजर पड़ने के बाद पुलिसकर्मियों ने कथित कार्रवाई रोक दी और कैमरों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की। CaRWAN ने कहा कि गिरफ्तार अन्य कार्यकर्ताओं रूपेश, आदित्य, अकृति और मनीषा ने भी हिरासत के दौरान पहले से रखी गई वस्तुओं को उठाने के लिए मजबूर किए जाने के आरोप लगाए हैं।
वरिष्ठ पत्रकार और प्रोफेसर जॉन दयाल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि किसी भी सरकारी अधिकारी को उसके पद या पारिवारिक पृष्ठभूमि के आधार पर जवाबदेही से बाहर नहीं रखा जा सकता। उन्होंने उत्तर प्रदेश में पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए पुलिस सुधार की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि आरोपियों को अदालत में जंजीरों में पेश करना, युवाओं के साथ कथित दुर्व्यवहार और धार्मिक या पहचान के आधार पर भेदभाव जैसी प्रवृत्तियां गंभीर चिंता का विषय हैं और इन्हें सामान्य नहीं होने दिया जाना चाहिए।
वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने अकृति चौधरी की NSA हिरासत रद्द किए जाने के हाईकोर्ट के फैसले को सकारात्मक घटनाक्रम बताया। उन्होंने कहा कि देश में छात्र, युवा और कामगार सरकार तथा प्रशासन से जवाबदेही की मांग कर रहे हैं और इस दबाव का असर न्यायपालिका के फैसलों में भी दिखाई दे रहा है। उन्होंने नोएडा के गिरफ्तार श्रमिकों और कार्यकर्ताओं के पक्ष में कानूनी लड़ाई लड़ रही टीम को बधाई देते हुए कहा कि रिहाई का अभियान देश के श्रमिकों, छात्रों और युवाओं के बीच भी ले जाने की जरूरत है।
जेएनयू के सेंटर फॉर इकोनॉमिक स्टडीज एंड प्लानिंग के सेवानिवृत्त प्रोफेसर अरुण कुमार ने कहा कि देश में करीब 94 प्रतिशत श्रमिक असंगठित क्षेत्र में हैं और उनके बुनियादी अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाला मजबूत संगठनात्मक ढांचा नहीं है। उन्होंने महंगाई और कम आय वाले श्रमिकों की मुश्किलों का जिक्र करते हुए कहा कि 10-12 हजार रुपये महीने कमाने वाले लोगों के लिए बढ़ती कीमतों का असर बेहद गंभीर है। उन्होंने सवाल उठाया कि देशभर में हो रहे स्वतःस्फूर्त श्रमिक आंदोलनों तक संगठित ट्रेड यूनियन कितनी पहुंच बना पा रहे हैं और असंगठित श्रमिकों को संगठित करने का रास्ता क्या होगा।
इस मामले में गिरफ्तार कार्यकर्ताओं का प्रतिनिधित्व कर रहे अधिवक्ता मानिक गुप्ता ने कहा कि मामले की मुख्य समस्या तथ्यों या कानून से ज्यादा प्रक्रिया से जुड़ी है। उनके अनुसार, शुरुआत से ही कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि आरोपियों के वकीलों को परेशान किया गया, जमानत की कोशिशों के दौरान नई धाराएं और एफआईआर जोड़ी गईं तथा NSA लगाया गया। उन्होंने यह भी दावा किया कि कुछ आरोपियों को हिरासत में कथित प्रताड़ना के बाद जंजीरों में अदालत में पेश किया गया। मानिक गुप्ता ने कहा कि NSA लगाने के लिए दिए गए कई आधार अदालत में टिक नहीं पाए और उनके समर्थन में पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए।
CaRWAN ने आरोप लगाया कि पूरे मामले के पीछे श्रमिकों के वेतन, काम की खराब परिस्थितियों और बढ़ती महंगाई से जुड़े वास्तविक सवालों को दबाने की कोशिश की गई। संगठन का दावा है कि नोएडा के औद्योगिक क्षेत्र में श्रमिकों को कम वेतन और कठिन परिस्थितियों में काम करना पड़ता है और उनके विरोध को दबाने के बजाय उनकी समस्याओं का समाधान किया जाना चाहिए। प्रेस कॉन्फ्रेंस के अंत में संगठन ने नोएडा के गिरफ्तार श्रमिकों और कार्यकर्ताओं की तत्काल रिहाई, पुलिस कार्रवाई की निष्पक्ष जांच और पूरे मामले में जवाबदेही तय करने की मांग दोहराई।

